छंद
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कोरोना का देख डर, छुपे घरों में लोग,
नहीं मिलता चैन वहां, कैसा है संजोग।
कैसा है संजोग, रोग यह रोज सताता,
धन दौलत से डरे ,नहीं वो हाथ लगाता।
कहे सिंह कविराय, सुनो काहे अब रोना,
आये जल्द वो दिन, मिटे जग से कोरोना।
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*होशियार सिंह यादव
मुक्तक
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1
वाह रे,वाह! कोरोना,
तेरा है जग में रोना।
आये रोटी रोजी को,
लाशों का लगा बिछोना।।
2.
भूले फास्ट फूड भोग,
ऐसा फैला जगत रोग।
आजाद जन घर में छुपे
कैसा हुआ है संजोग।।
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स्वरचित मौलिक रचना।
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*होशियार सिंह यादव
दिल की आरजू
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आंखें नहीं मिलती, हो जाती है गुफ्तगू,
हर जीव छुपाये रखता,दिल की आरजू।
फूल के दिल में होती,सुंदर एक आरजू,
पूजा में प्रयोग करे, लेते रहे मेरी खूशबू।
पत्नी के दिल में होती,पति दिल में बसे,
पाकर मुझको फूल जैसा,दिनभर वो हंॅंसे।
चंदन की है आरजू,हर जन माथे लगाये,
ठंडक प्रदान करूं, खुद हॅंसे और हॅंसाये।
देशभक्त की आरजूं, देश पर मिट जाऊं,
जगवाले याद करे,तिरंगे में लिपटा आऊं।
विद्यार्थी कहे गुरु से,पढ़कर नाम कमाऊं,
माता,पिता,गुरु का, सारा ऋण मैं चुकाऊं।
कहे कवि जग को,ऐसी कविता मैं बनाऊं,
हित करूं जन का, भूले को राह दिखाऊं।
आरजू हर दिल में है,किसका हाल सुनाऊं,
गुरु को नमन करूं,निज दिल में लौ जलाऊ।
सत्ता
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नेता को सत्ता मिली, करें नहीं जन काम।
लोग उन्हें यूं पूजते, जैसे शिव का धाम।।
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आंसू, मजदूर,गांव
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आंसू
होता जब गरीब दुखी, ऑंसू देेते साथ।
जब मार्ग ना सूझता, दाता पकड़े हाथ।।
मजदूर
करे कमाई दिन रात, होता है मजबूर।
बच्चे भी भूखे मिले, कहलाता मजदूर।।
गांव
जाना होता जब शहर, याद आते हैं गॉंव।
साफ हवा मिलती नहीं, होती ना तरु छॉंव।
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*होशियार सिंह यादव
गंजा
दोहा...
चमके गंजी खोपड़ी, आता है भूचाल।
टोला मारे जोर का, पूछे जनाब हाल।।
सत्ता
नेता को सत्ता मिली, करें नहीं जन काम।
लोग उन्हें यूं पूजते, जैसे कोई धाम।।
ऋतुराज
खिल उठे धरती अंबर, बजते दिल के साज।
ओढ़ फूलों की चुनरी, आता है ऋतुराज।।
खामोश
फूलों ने बांहें फैलाई,आओ ले लू आगोश।
हंसी खुशी से रहना सीखो,मत रहो खामोश।।
बस तबाही के सिवा और मयस्सर क्या है।
मुशायरे का ज्ञान कम यूं खुश्क हवा है।



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