नजर लग गई
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विधा-कविता
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नजर लग गई संस्कृति, भूले बिसरे लोग,
अर्धनग्र, भोंडी भाषा बोले, कैसा है रोग।
मर्यादा को भूल गये, पाश्चात्य की चाहत,
मांस मंदिरा सिगरेट का लगा रहे हैं भोग।।
नजर लग गई संस्कृति,बुजुर्ग हुये परेशान,
मुंह छुपाकर मिलते हैं,समझे अपनी शान।
मार पीट करते देखे जन,कैसा है बदहाल,
बूढ़े अनाथालय रहे,घोर किया है अपमान।।
नजर लग गई संस्कृति, युवा भूले प्रणाम,
सुबह शाम बस ख्यालों में,भूले राम नाम।
बोलचाल भाषा गई, व्यसनों के रहे संग,
बुजुर्ग और गुरु को, करते मिले बदनाम।।
नजर लग गई देश को,शिक्षा घटा स्वरूप,
नालंदा,तक्षशीला कभी, शिक्षा के थे रूप।
विदेशों के जन आते थे, देखने को वे देश,
मिलती थी छांव कहीं,अब मिलती है धूप।।
नजर लग गई चमन को, मुरझाये हैं फूल,
अपने ही उजाड़ रहे, कर रहे जमकर भूल।
अपनों को ही मार रहे,नहीं किसी की खैर,
कैसा हुआ इंसान यह, बदल गये हैं वसूल।
नजर लग गई युवा वर्ग, भूले अपना काम,
मात पिता और गुरुजन, समझो वे हैं धाम।
पर युवा उनको भूले, कैसा बुरा है ये वक्त,
अपने ही सींच रहे,बहा रहे हैं जमकर रक्त।।
नजर लग गई इंसान को,धन का है लोलुप,
भूख प्यास सब भूलकर,भूला है पीना सूप।
धन के लिए कत्ल करे, लगाते न कोई देरी,
बदल गया व्यवहार भी,पूजती दुनिया रूप।।
नजर लगी लोगों को,करते उल्टे सब काम,
भूल गये दाता को, भूल गये मंदिर व धाम।
आने वाला वक्त भी होता जा रहा बदहाल,
गंदी हो गई नजरें जन, भूल गये अब राम।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
ख्वाब/स्वप्र/सपना
विधा-दोहा मुक्तक
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सपनों में जीते कई, मिले हकीकत दूर।
खाली जेब जनाब की, मन में बड़ा गरूर।।
जाना पड़ता छोड़कर, जग की मानो रीत,
अंतिम घडिय़ां पास हो, गायब तन से नूर।।
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लेता ख्वाब हजार जन,पूरा कभी न एक।
धर्म कर्म से दूर हो, चर्चा चले अनेक।।
सच में ताकत है बड़ी, मान रहा संसार,
सच का दामन पकड़कर,दाता की ले टेक।।
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मौलिक एवं अप्रकाशित
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* होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400


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