Wednesday, April 20, 2022

                              धरती मां
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विधा-मनहरण घनाक्षरी

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सुंदर छवि देश की, मन में उपजे नूर।
मन मुदित हो जाये, पास तो आइये।।

फूल,कली खिल रही, तितली उड़े हजार।
खुशबू मन मोहती, दिल में बसाइये।।

हरी भरी धरती मां, दूर गगन की छांव।
मन खुश हो जाएगा, दूर नहीं जाइये।।

पुकार रही मां धरा, तन मन हो सरस।
साफ हवा जहां मिले, लाभ तो उठाइये।।


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स्वरचित/मौलिक
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* डा  होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400




                             मर्यादायें
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विधा-कविता   
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मर्यादाओं में बंधा हुआ, धरती और आकाश,
मर्यादाएं जब भंग हो जाती,निश्चित है विनाश।
मर्यादाओं के आगे झुके,देव,लोग और दानव,
धरती का हर प्राणी बंध जाएं,मर्यादा में काश!

मर्यादाओं में बंधे राम,मर्यादा पुरुषोत्तम कहाए,
काटे कितने संतों के बंधन,गुरुदेव बने सहाय।
14 वर्ष बनवास सहा, हर कदम नाम कमाया,
मित्र,सखा,बंधु बांधवों को, निज गले लगाये।।


मर्यादाओं में बंधकर, राजा हरिश्चंद्र कहलाते,
सत्य से नहीं दूर हटे, कष्टों को गले लगाते।
दुर्वासा ने ली परीक्षा, हर परीक्षा हुये सफल,
मरघट कर रखवाली,कत्र्तव्य को गले लगाते।।

श्रवण कुमार का नाम ले,याद आता एक वीर,
मात पिता तीर्थयात्रा करा, रखकर मन में धीर।
हुआ न होगा ऐसा बालक,रहेगा सदियों नाम,
मात पिता का सहारा बन, हर लेता था पीर।।

सगर, अंशुमान गये, फिर आये थे भागीरथ,
गंगा को धरा पर लाये, तपस्या में रहते रत।
हजारों पितर उद्धार किया, मर्यादायें निभाई,
साहस के कारण ही, पितरों की मिटी दुर्गत।।

सूर्य,चंद्रमा,तारे,पृथ्वी, अपना फर्ज निभाते हैं,
कोई रात से दिन करे,कोई रश्मि धरा लाते हैं।
अमर्यादित अगर बन जाये,हो जा घोर अंधेरा,
यूं न हो पथ से विचलित,धरा जगमगाते हैं।।


भूल कभी नहीं जाना, मर्यादायें आती काम,
मर्यादाओं को निभाता, जग में होता है नाम।
मर्यादाएं मानव के,जिंदगीभर काम आती हैं,
रावण भांति अमर्यादित, हो जाता है बदनाम।।

चर्चा चलती मर्यादा की,श्रीराम आते हैं याद,
दुष्ट,राक्षस टिक नहीं पाये,करते देखे फरियाद।
मर्यादा के पथ पर चलना,नाम अमर हो जाये,
पग पग पर मर्यादा तोड़े, कहलाता है जल्लाद।।
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स्वरचित/मौलिक






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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

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