Wednesday, December 09, 2020

 

लज्जा
विधा-छंदमुक्त
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लज्जा  एक गहना है,
मिलता हर इंसान में,
लज्जा बिना अधूरा है,
लज्जा अब अपनाइये।

नारी की  लज्जा खास,
बिना लज्जा कैसी नारी,
लज्जा  घर और बाहर,
लज्जा कहीं न छोडिय़े।

लज्जा जिस में हो नहीं,
इंसान नहीं वो कहलाए,
पशु पक्षी भी लज्जा रखे,
लज्जा जीवन में अपनाए।
दलदल
विधा-कविता
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दलदल दर्द देती है सदा,
इंसान  समक्ष जब आये,
दलदल में एक गिर गया,
वो कभी नहीं बच पाये।

दलदल पानी में मिलती,
उसमें फंस जाते हैं जीव,
दलदल जब घर के पास,
सुदृढ़ नहीं बचेगी नींव।

दलदल दिखती काम में,
बचकर रहना उस काम,
वरना पतन हो मानव का,
हो जाएगा जग बदनाम।

दलदल से बचकर चलो,
गिरकर वहां हो जा अंत,
दलदल से जगत बचाइये,
कहते कितने महान संत।

परिंदे
विधा-कविता
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किसी ने पूछा डाल से,
पक्षी कहां के हैं वाशिंदे,
उड़ते फिरते डाल डाल,
डाल पे घर बनाते परिंदे।

नहीं किसी से बैर भाव,
खाते हैं फल फूल टिंडे,
प्रकृति की अद्भुत रचना,
कहलाते हैं जग में परिंदे।
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चित्र लेखन
विधा-कविता
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कुशल कारीगर बया होता,
बारिश व आंधी नहीं रोता,
सर्दी, गर्मी कभी पड़ती हो,
आराम से नींद बच्चा सोता।

टेलर बर्ड नाम होता इसका,
तिनका तिनका करे इकट्ठा,
छोटा सा यह सुंदर पक्षी हो,
ना मिले कभी हट्टा कट्टा।

सीख इसी ने दी बंदर कभी,
खोया डाला अपना इसने घर,
पर जो शिक्षा देते हैं जग को,
नहीं होना चाहिए कभी डर।

सदा सबक देता यह आया,
पक्षी  होकर यह इंसान को,
हजारों सालों से चला आया,
खोता नहीं निज पहचान को।

बया नाम का पक्षी जगत में,
छोटा,सुंदर,अजब निराला है,
उसको सदा  खुशी मिली है,
जो दे पक्षियों को निवाला है।

बस तुम









विधा-काव्य/शायरी
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लाख छुपाते तुम दामन, लगते हो गुमसुम।
नहीं बचोगे नजरों से, निशाने पर बस तुम। 1।

आएगा एक दिन, दौड़ पड़ोगे आवाज सुन।
दिल में मेरे बसे हो, चीरकर देखो बस तुम। 2।

सोच लो कोई तुम्हारा, होगा एक दिन गुम।
परदे में छुपे नजर आते, चाहत है बस तुम। 3।

खेल अधूरा छोड़ रहे हो, कैसी खोये धुन।
आना होगा पास हमारे, प्रिय हो बस तुम। 4।

यादें सीने में दफन हैं, मन की बातें ले सुन।
कर्म धर्म विश्वास कर, मन में बसे बस तुम। 5।

मोहित हुये आज ही, जैसे नशेड़ी होता टुन।
सुन लो आवाज जहां की, पुकारती बस तुम। 6।

लगते मन को प्रिय, जैसे उपवन खड़ी कुसुम।
आज नहीं तो कल पाना,दिल प्रिय बस तुम। 7।

बागों में मुस्कुराती हो, लगती जैसी कुमकुम।
चुन लिया माली ने अब, मन बसी बस तुम। 8।

सहारा मिलता है तुमसे, जैसे उष्ट्र की हो दुम।
बस सहारा मिल जाये,पात्र लगती बस तुम। 9।

देखकर मेरी सांवली सूत, हो न जाना तुम गुम।
यादों का सहारा बनी हो,यादों रहना बस तुम।10।

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