अन्नदाता
विधा-दोहे
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आज अन्नदाता कहे, सुन लो मेरी बात।
अन्न बचाना सीख लो, वरना होगी रात।।
देख अन्नदाता लगे, बुरा बहुत है वक्त।
अन्न खेत से पाने को, बहा रहा है रक्त।।
कभी अन्नदाता नहीं, करता है आराम।
खेती उसका धर्म है, यही एक है काम।।
नहीं अन्नदाता लगे, सुधरेगी हालात।
खेती करना काम है,धरती होती मात।।
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मानवता अब रो रही, हुये लोग बेकार।
भाई भाई दुश्मनी, घटा रही जग प्यार।।
मानवता का नाम ले, करते अत्याचार।
खूनी दुश्मन बन गये, घटा जगत में प्यार।।
मानवता के सामने, दानवता की मार।
मार काट वो कर रहे,रहा नहीं अब प्यार।।
मानवता अब खो चुकी, किसको दे अब दोष।
जन जन में ही बढ़ गया,मन मन में ही रोष।।
विधा-कविता
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जाने कहां गये, सुनहरे पल,
किसान बैल चलाते थे हल,
ढोल भरी से पानी खिंचाते,
हैंड पंप से चलते फिर नल।
मथनी हाथ से चलती थी,
मक्खन दही मथकर लेते,
गरीब बेचारे जौ चने खाते,
उस पर मक्खन छाछ लेते।
चक्की से घंटों अन्न पीसते,
क्या मजा आता खाने में,
टीवी सभ्यता नहीं होती,
मजा मंच से था गाने में।
भाई बहन का प्यार था,
तोड़े से नहीं तोड़ा जाए,
मोबाइल चाय चुसकी से,
करते बुढ़ापे में हाये हाये।
सेहत बनती औरत की,
जब चक्की चलाती थी,
पांच किलो अन्न पीसती,
हँसती और हँसाती थी।
देश की धरती
विधा-छंदमुक्त
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इस धरती ने दिये लाल
लाल,बहादुर, भगत सिंह
मिला था उनको ही सदा,
देश की धरती का प्यार।
लड़ लड़कर वो मर गये,
कर गये देश पर ही नाम,
नहीं भूला पाएगा ये जहां,
बनी है देश की पहचान।
कितने आये चले गये वो,
नहीं मिटा वीरों का नाम,
तूफान बनकर वो आये थे,
दिखा गये लोगों को राह।
कविता
विधा-कविता
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साहित्य जगत अति निराला,बोले बात लगे भोला भाला,
उनकी कलम कभी चली है,दोष समाज तब दूर निकाला,
साहित्यकार जगत में आये,साहित्य से किया नौनिहाल,
शब्दों की वो मार कर डाली,पल में बदली जग की चाल।
प्रेमचंद,दिनकर, बच्चन आये,साहित्य ने जगत जन लुभाये,
यशपाल, महादेवी व त्रिपठी,निराला,तुलसी जैसे जग छाये,
महादेवी,गुप्त ने छेड़ी थी तान,गुलेरी, पंत की बढ़ी थी शान,
माखन,कबीर,रहीम, सूरदास,साहित्य की रही देन महान।
उर्दू में जो काव्य लिखते रहे,कहलाते हैं वो जग में शायर,
काव्य से जो कवि डरता हो,वो कहलाए संसार में कायर,
खुसरो, हसरत,फाजली,मिर्जा,इकबाल, गालिब, राणा, मीर,
बेचैन, जफर,दुष्यंत, बिस्मिल,शायरी से हरी जगत की पीर।
कवियों की देश में लंबी सूची,सभी की रही है काव्य में रुचि,
जुनून आज दिन काव्य मिलता,पर लेखन में मिलती है अरुचि,
तुलसी,कबिर, रहीम, रसखान,मीरा, खानखाना,खुसरो हुये हैं,
वर्मा,कबीर,चक्रधर,सहजोबाई,काव्य में इन्हें जिंदगी बीताई।
केदार,कुंवर, कृपालु, चतुर्वेदी, नीरज, प्रसाद, भारती कवि नाम,
जोशी,गुप्ता, राही कवि हुये है,समाज सुधार रहा बस काम,
वृंद, शैल, सुभद्रा,निराला हुये,सुमन, जोशी हुये वात्साययन,
पांडेय, शर्मा, पंत, गुप्त कवि,जिनसे बनी थी भारत पहचान।
भारती,शंकर,दास,तारा, ठाकुर,मेहता, ग्रोवर, टेगोर और राही,
कितने ही कवि हुये जगत में,जिन्होंने जिंदगी में की हँसाई,
कवि,शायर हो या साहित्यकार,मिलता कलम,जग,जन से प्यार,
अपनी ओज,तेज,वाणी से कहे,नहीं रखते कोई बात वो उधार।
समाज सुधारा और देश सुधारा,सुधारा है उन्होंने यह पूरा संसार,
साहित्य के कारण नाम आज है,कवियों से लोगों को अब प्यार,
एक जमाना था जब परतंत्र देश,कलम,तलवार रखते साथ साथ,
देश को आजाद कराया वीरों ने,कवि,लेखकों का भी रहा हाथ।
साहित्यकार हुये खूब जगत में,जिनका निस्वार्थ होता था काम,
कवि कल्पना करके वार करता,कर देता दुश्मन का काम तमाम,
नमन आज सभी साहित्यकारों,नमन आज सभी शायर, कवि,
उनकी कल्पनाएं अलौकिक हो,कवि जहां मिले नहीं वहां रवि।।




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