धर्म और आस्था
विधा-कविता
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धर्म और आस्था भारी,
भारत में अनोखी न्यारी,
धर्म आस्था की आड़ में,
बन बैठे कितने व्यापारी।
मंदिर मस्जिद खूब बने,
पर भूख की हो लाचारी,
मंदिर आगे खड़े हैं भूखे,
बस उन्हें रोटी है प्यारी।
देवों के नाम पर लुटती,
दौलत से अबला-नारी,
अस्मिता लूटे ढोंगी जन,
आस्था पर पड़ते भारी।
आस्था बुरी नहीं होती,
अंधी दौड़ा आस्था हार,
आस्था मन में रख लेना,
करो हर मानव से प्यार।
मंदिर मस्जिद जब जाते,
बूढ़े, गरीब को दो प्यार,
कोई भूखा नंगा नही रहे,
आस्था है जीवन आधार।।
नव वर्ष तेरा स्वागत
कविता
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2020 तेरा, नाश हो,
दिया जग दर्द हजार,
नव वर्ष तेरा स्वागत,
देना प्रसन्नता हजार।
जल्दी कर, चला जा,
महामारी तू ले आया,
गरीब,बच्चा बूढ़ा तूने,
दुख दर्द देकर रुलाया।
छीन लिया रोजगार भी,
रोका है उन्नति विकास,
घरों में छुपकर बैठे रहे,
बना डाले घर के दास।
सदियों तक तुझे जानेंगे,
राक्षसी रूप में महामारी,
कितने घर उजाड़ दिये,
रो रही एक वृद्ध बेचारी।
आजा रे! नव वर्ष 2021,
देना खुशियां, देना प्यार,
पलक फावड़े बिछाये हैं,
बेसब्री से तेरा है इंतजार।।
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तन्हाई
विधा-छंदमुक्त कविता
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रातें गिनते हैं रोज ही,
आये दिन बड़े खराब,
तन्हाई की है जिंदगी,
किसको बताये जनाब।
तन्हाई में रोग मिलते,
देख लो कोई आजमा,
रो रोकर बीते जिंदगी,
सुन लो हमदम जनाब।
तन्हाई में मर मर जीये,
नहीं मिलता कभी चैन,
रात दिन बराबर बनते,
मन मचले रहता उदास।
तन्हाई में बड़ा आनंद,
जिन देखा उससे पूछो,
महबूबा से कह देना है,
मरकर भी ना तुम रूठो।।
दोहा
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नया साल यूं कह रहा, हे मानव तू जाग।
भूल सदा जो दिल भरी, तेरे मन में आग।।
सोरठा
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हे मानव तू जाग,नया साल यूं कह रहा।
तेरे मन में आग,भूल सदा जो दिल भरी।।
तुम तो वाकिफ हो
विधा-काव्य/मुक्तक
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तुम तो वाकिफ हो सदा,बुरा बहुत अभिमान।
अनुभव जग में लो कभी, बढ़ जाता है ज्ञान।।
बुरे कर्म जग भूलकर, कर ले जनहित काम,
दुखा नहीं दिल देव का, वरन मिले शमशान।।
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तुम तो वाकिफ हो
विधा-काव्य/मुक्तक
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तुम तो वाकिफ हो मुझे, करता सुंदर काम।
साधु संत यह कह रहे, जन जीवन संग्राम।।
डरकर भागे जो कोई, हरदम होता फेल,
तूफानों से जो लड़े, होगा जग में नाम।।







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