कुंडलियां ***************
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आँखें नीची कर कही,लोक लुभावन बात ।
भूख गरीबी खत्म होंं, हो धन की बरसात ।
हो धन की बरसात , खुलेंगे इतने धन्धे ।
जग में हों मशहूर , वतन मेरे केे बन्दे ।
अब रहना उस ढाल , राम जैसे भी राखें ।
नहीं सुने दुख दर्द , बदल लेता हैं आँखें ।।
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जिसका मन रहने लगे , सदैव चलायमान ।
नहीं चैन से रह सके , सुन ऐसा इंसान ।
सुन ऐसा इंसान , सदा हिचकोले खाए ।
रहता भय अज्ञात , सदा उस पर मडराए ।
खुद है डामाडोल , काम वह करदे किसका ।
लगे सदा गमगीन , हाल ऐसा हो जिसका ।।
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दोहा****************
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भारत मां की आन पर, मिट जाते हैं वीर।
धरा लहू से सिंचते, जन की हरते पीर।।
लहराता जब देश में, बढ़ेे तिरंगा शान।
कुर्बानी से वीर की, बने अलग पहचान।।
मधुप सुमन पर घूमते, करते मधु रसपान।
मान नहीं करते कभी, पूरे जग पहचान।।
गीत
विषय-शीत ऋतु आई
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शीत ऋतु आई, मनभाई,
बच्चों ने खुशियां मनाई।
टिन्नी पहने लाल स्वेटर,
रामू ओढ़ रहा रजाई,
टिन्नी म्याऊं म्याऊं करे,
रामू ने सीटी बजाई,
शीत ऋतु..............।
मां बनाये गोंद पँजीरी,
सुंदर थाली में सजाई,
राम के मुंह पानी आया,
जमकर तब पँजीरी खाई,
शीत ऋतु..............।
ओढ़ रहे वो कँबल भारी,
ठंड से तब जान बचाई,
गर्मागर्म कचौड़ी बना,
रामू टिन्नी जमकर खाई,
शीत ऋतु..............।
सेदोका
शीर्षक- कुहरा
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श्वेत चादर
दूर तक दिखती
नजरें भी टिकती
मन प्रसन्न
कुहरा पड़ रहा
निकल जाये कहां।
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रास्ता मेरे गांव का
विधा-कविता
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बल खाता हुआ
टेढ़ा मेढ़ा जाता
रास्ता मेरे गांव
पर्वत से मिलाता।
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रास्ता गांव तक
हो सर्पीलाकार,
चलते चलते ही
जन जाता हार।
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गाय, भैंस,बकरी
चराने का वास्ता,
मां मंदिर बने हो
उन तक ले जाता।
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पहाड़ की पगडंडी
होता दुर्गम रास्ता,
कभी कभार चढ़ते
कम होता है वास्ता।
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है प्राकृतिक संपदा
धरती,पहाड़, जल,
इनकी सुरक्षा करो
कल,आज व कल।
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चलते रहो सदा ही
जन की बने बुलंदी,
सफलता पाने वास्ते
तलाश लो पगडंडी।





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