जरा सुनो
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आज का विषय-भूख हड़ताल पर अन्नदाता
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भूख हड़ताल पर अन्नदाता, नेता मौज उड़ाता।
दो जून रोटी कमा ले, अब नेता नहीं सुहाता।।
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दोहा
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मन पर बंदिश कब लगे, घूम रहा आजाद।
आएगी यह मौत तो, बेशक कर फरियाद।।
लाख मनाया मौत को, काम न आता ज्ञान ।
रिश्वत भी चलती नहीं, अटल सत्य ले मान।।
खाकी वर्दी देश में, सेवा की पहचान।
दागदार जब यह बने, घटे जगत में शान।।
कुछ तो है
विधा-कविता
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कुछ तो है जो, तुम याद आये,
लगा कोई साथी पास में आये,
कभी मन इतना प्रसन्न हो जाये,
रोता हुआ चेहरा खुश हो जाये।
कुछ तो है प्रभु की शरण जाते,
अपने सारे ही, कष्ट भूल जाते
उसकी लीला में इंसान रमता है,
कभी देखा उसे कभी खुद गाते।
कुछ तो है रात जब सपने आते,
कभी कभी तो वो दिल तड़पाते,
अपने पराये को, हम भूल जाते,
पर कभी वेे मन को अति सताते।
कुछ तो है जो अपने याद आते,
हँसते गाते वो फिर घर से जाते,
अपने मन का वो, दिया जलाते,
प्रेम का सार बस वहीं कहलाते।
कुछ तो है मां आशीर्वाद मिलता,
मन ही मन भक्ति फूल खिलता,
जहां भी जाये बस मां याद आये,
इसी से ही मन को शकुन मिलता।
कुछ तो है जो यूं पिता प्यार पाते,
सदा ही आगे बढ़े और मुस्कुराते,
उनकी छत्र साया सदा याद आती,
उनको याद करके मन को सजाते।
कुछ तो है जो, प्रिय दोस्त मिलते,
संग में हँसते संग संग साथ चलते,
कभी गम सताये वो दौड़कर आये,
हर सुख दुख में वो पास में मिलते।
कुछ तो है जो जग भाई बहन पाते,
उनके संग खेलकूद कर उम्र बिताते,
बिछुडऩे का गम यूं, दिल से लगाते,
कभी आंधी तूफान से हमको बचाते।
कुछ तो है कभी, हम मंदिर में जाते,
ईश्वर की असीम कृपा सिर पर पाते,
कभी दर्शन प्रभु के हम करते तो लगे,
हमारे हर कष्ट में प्रभु दिल से लगाते।
कुछ तो है जब घर में, मेहमान आते,
उनका सानिध्य पाके गदगद हो जाते,
इसे ही कहते वक्त शुभ था हम मिले,
चार दिनों का जीवन, दिल से लगाते।
कुछ तो है जो जग को गतिमान करता,
आकाश के बादलों में रश्मि सा लगता,
कभी धरा पर वर्षा का पानी सा बहता,
कभी माथे की बिंदिया चंदन सा सजता।।
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-जिंदगी एक पतंग
विधा-कविता
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पतंग बनी जन जिंदगी,
उड़ती फिरती हर रोज,
सुख,दुख से भरी मिले,
कहानी शीर्षक है खोज।
कब छूटे पतंग डोर से,
कहीं जाकर गिर जाये,
उड़ाने वाला देखता रहे,
अनजान इसको उड़ाये।
कभी आसमान छू जाये,
कभी धड़ाम में कट गिरे,
कभी पास वो आ जाये,
कभी दूर वो जाकर गिरे।
जिंदगी रूपी पतंग का,
कभी होता, दुखद अंत,
कभी कभी इस पतंग से
खुशियां मिलती अनन्त।
ये पतंग जिंदगी की लगे,
मिल गया कोई उपहार,
कभी कभी पास रखकर,
मन ही मन में हा हाकार।
कुछ पतंग तो लंबे समय,
छोड़ जाती एक यादगार,
कुछ पतंग, कभी कटती,
जन का ना मिलता प्यार।।
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स्वार्थ विधा-कविता
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स्वार्थ भरा इंसान में,
स्वार्थ परिपूर्ण काम,
लोक लाज मन नहीं,
हो जग में बुरा नाम।
स्वार्थ के बल पर ही,
बिगड़ जाते सब काम,
निस्वार्थ जहां मिलता,
बनता स्वर्ग का धाम।
होना चाहिए स्वार्थ
आटे में नमक समाय,
वरना यह जगत बुरा,
किसी काम ना आय।
निस्वार्थी पेड़ मिलते,
देते सदा फल- फूल,
चाहे उनको काट दो,
नहीं करते कभी भूल।
निस्वार्थी नदी कुयें हैं,
खुद नहीं पीते हैं पानी,
जन का हित वो करते,
करते नहीं वो मनमानी।
निस्वार्थ भाव भरा था,
भागीरथ गंगा ले आये,
जनहित में दधिच हुये,
इंद्र खातिर जग समाये।




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