कुंडलियां
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आँखें नीची कर कही,लोक लुभावन बात ।
भूख गरीबी खत्म होंं, हो धन की बरसात ।
हो धन की बरसात , खुलेंगे इतने धन्धे ।
जग में हों मशहूर ,नहीं आंखों से अंधे ।
अब रहना उस ढाल , राम जैसे भी राखें ।
नहीं सुने दुख दर्द , बदल लेता हैं आँखें ।।
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नमन
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अपनी धुन में खो रहे, खुश रहते हर हाल।
साधु संत बाणा लगे, सुंदर उनकी चाल।।
बने सौहार्द देश में, मिलकर हो जब काम।
भाईचारा तब बढ़े, होगा जग में नाम।।
अदृश्य दुश्मन से बचो, करता घातक वार।
चिकनी चुपड़ी बात में, नहीं मिलेगा प्यार।।
जाड़े की धूप
विधा-कविता
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जाड़े की ऋतु जब आती
पहनते हैं कपड़े कई-कई,
विभिन्न पोषाक पहनकर,
शक्लें लगती हैं नई-नई।
जाड़े में सुहानी लगे धूप,
मन को मिलता आराम,
घंटों बैठे रहते धूप में ही,
करते नहीं कुछ भी काम।
जाड़े की धूप में बैठे जब,
आलसी बन जाता शरीर,
सर्दी तन की कम होती है,
कम हो जाती तन की पीर।
गर्म-गर्म चाय का प्याला,
मूंगफली गजक हो साथ,
गर्म पकौड़े, गर्म समोसा,
मिलते रहे सदा ही हाथ।
जाड़े की धूप कह रही,
आओ बैठों ले लो धूप,
खाना बाद में खा लेना,
पहले पी लो गर्म सूप।।
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आंसू/कविता
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आंसू
अनमोल होते हैं आंसू,
पवित्र ये कहलाते हैं,
जब आंखों में आते तो,
गम की याद दिलाते हैं।
कभी कभी ये आंसू तो,
खुशियों से आ जाते हैं,
कभी कभी आंसू बहा,
रोगों से बच जाते हैं।
आंसू दिल का बयां करे,
आंसू गम खुशी इजहार,
कभी एक आंसू न आए,
कभी गिरे ये कई हजार।
आंसू का मोल नहीं है
पता कर लो बाजार से
अगर धोखा देना बस है
संजोकर रख लो प्यार से।







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