विधा-पैरोड़ी
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तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो,
अपने दामाद के गुण गा रहे हो।
दामाद ठिगना सिर से है गंजा,
क्यों यह बात तुम छुपा रहे हो।
काला कलूटा है पेड़ सा मोटा,
क्यों धौंस जन पे जमा रहे हो।
आता तेरा घर पेंट फटी होती,
शर्ट पर तुम कज लगा रहे हो।
रंग का है काला कजरा लगाये,
भैंस के आगे बीन बजा रहे हो।
देख देख जन उसको मुस्कुराये,
तुम उसके गुण जमकर गा रहे हो।।
प्रकृति
विधा-कविता
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मन को विभोर किया
कभी गर्मी कभी सर्दी,
कभी मन को मोह ले,
दूर दराज तक प्रकृति।
कहीं फूलों की डाली,
कहीं है कोयल काली,
कहीं किसान हो हाली,
कहीं सुवा बजाए ताली।
अंबर पर बादल झूमते,
कभी बरसता है पानी,
कहीं पेड़ मृतप्राय लगे,
कहीं आये तरु जवानी।
प्रकृति को देख देखकर,
मन में उठ रहे विचार,
कभी कभी मन करता,
मचल उठे दिल प्यार।
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सचित्र काव्य सृजन
विधा-कवित
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गरीबों के बादाम/कविता
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गरीब बेचारे भूखे रहते,
मिलता ना उन्हें भोजन,
दिनभर मेहनत करते हैं,
वक्त नहीं है प्रभु भजन।
गरीबों के आम लगते हैं
पेट भरकर सब खाते हैं,
गरीबों के सेव बेर होते ,
बस उनके हिस्से आते हैं।
सर्दी में नहीं बादाम मिले,
ठेले पर मूंगफली मिलती,
मूंगफली जमकर खाते हैं,
ये गरीब बादाम कहाते हैं।
गरीब नसीब नहीं सोडा
वो बस मन बहलाते हैं
मूंगफली वो चाब लेते हैं,
ये ही अमृत कहलाते हैं।
अंधियारे ने खूब निभाई,
जीवनभर रिश्तेदारी
विधा-गीत
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अँधियारे ने खूब निभाई,
जीवनभर रिश्तेदारी।
अँधियारे ने खूब निभाई,
जीवनभर रिश्तेदारी।
कभी कभी मुझको लगती हैं,
चांदनी रातें भी प्यारी।।
जब बैठकर सोचने लगते,
तन मन मंदिर भी रोता।
सर्दी मौसम मार पड़ती तो,
कैसे कोई जन सोता।।
मेरे मन को आज मिली हैं,
खुशियां अब प्रेम बहाने।
क्यों जिंदगी खराब कर रहे,
लोग लगे मुझे मनाने।।
अँधियारे ने खूब निभाई,
जीवनभर रिश्तेदारी।
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सर्द हवा/शीत ऋतु
विधा-कविता
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शीत ऋतु
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शीत ऋतु जब आती ,
तन मन करती विभोर,
सर्द हवा के झोंके में,
जन मन नाचता मोर।
मौसम पल पल बदले,
कभी सर्दी, कभी गर्मी,
मौसम की मार पड़े तो,
लोगों में दिखेगी नरमी।
कभी नभ में बादल हैं,
कभी आती है बरसात,
कभी दिन गर्म होता है,
कभी ठंडी होती है रात।
कभी सूरज चमकता है,
कभी बादल लेते हैं घेर,
कभी धुंध ही धुंध होती,
राहगीरों को होती है देर।
रजाई में लिपटे मिलते,
जन लेते हैं आग सहारा,
रजाई में छुपकर सो जाए,
सर्दी का मौसम है प्यारा।
तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो
विधा-पैरोड़ी
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तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो,
अपने दामाद के गुण गा रहे हो।
दामाद ठिगना सिर से है गंजा,
क्यों यह बात तुम छुपा रहे हो।
काला कलूटा है पेड़ सा मोटा,
क्यों धौंस जन पे जमा रहे हो।
आता तेरा घर पेंट फटी होती,
शर्ट पर तुम कज लगा रहे हो।
रंग का है काला कजरा लगाये,
भैंस के आगे बीन बजा रहे हो।
देख देख जन उसको मुस्कुराये,
तुम उसके गुण जमकर गा रहे हो।।
प्रकृति
विधा-कविता
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मन को विभोर किया
कभी गर्मी कभी सर्दी,
कभी मन को मोह ले,
दूर दराज तक प्रकृति।
कहीं फूलों की डाली,
कहीं है कोयल काली,
कहीं किसान हो हाली,
कहीं सुवा बजाए ताली।
अंबर पर बादल झूमते,
कभी बरसता है पानी,
कहीं पेड़ मृतप्राय लगे,
कहीं आये तरु जवानी।
प्रकृति को देख देखकर,
मन में उठ रहे विचार,
कभी कभी मन करता,
मचल उठे दिल प्यार।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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गरीबों के बादाम/कविता
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गरीब बेचारे भूखे रहते,
मिलता ना उन्हें भोजन,
दिनभर मेहनत करते हैं,
वक्त नहीं है प्रभु भजन।
गरीबों के आम लगते हैं
पेट भरकर सब खाते हैं,
गरीबों के सेव बेर होते ,
बस उनके हिस्से आते हैं।
सर्दी में नहीं बादाम मिले,
ठेले पर मूंगफली मिलती,
मूंगफली जमकर खाते हैं,
ये गरीब बादाम कहाते हैं।
गरीब नसीब नहीं सोडा
वो बस मन बहलाते हैं
मूंगफली वो चाब लेते हैं,
ये ही अमृत कहलाते हैं।
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Saturday, December 12, 2020
तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो
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