जरा सुनो
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आज का विषय-
देश और धर्म के साथ खिलवाड़ आखिर क्यों?
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देश और धर्म से खिलवाड़ घातक रहा है और इनसे खिलवाड़ समाज को गर्त में ले जाता है।
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गरीब
विधा-क्षणिकाएं
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हिम्मत से गरीब नहीं,
कहलाते वो ही अमीर,
जो होते हैं जग गरीब,
दोष देते हैं वो नसीब।
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अमीर गरीब है तन से,
करवा कर देख तन काम,
पैसे हाथ का मैल हो,
जिसके बल पर हो नाम।।
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नव वर्ष
विधा-छंद
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दोहा छंद
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नया साल यूं कह रहा, करना सुंदर काम।
पाप कर्म पर गर चला, हो जाए बदनाम।।
प्रसन्न रहना चाहिए, मानव को हर हाल।
दस्तक देने को चला, मनभावन नव साल।।
नये साल की लालिमा, छाई चहुँ दिश ओर।
वन उपवन में नाचते, पक्षी भारत मोर।।
छाई है आंगन खुशी, नये साल की भोर।
आगे बढ़कर सीखना, नाच नृत्य सम मोर।।
सुनी मुबारक राम ने, बोला आओ श्याम।
खुशियों से झोली भरे, मन मंदिर सम धाम।।
नये साल में खुश रहो, हरना दुख जन रोज।
नहीें शांति जग में कहीं, अपने भीतर खोज।।
धरती
विधा-कविता/वसुंधरा
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पले बड़े हुये गोद में,
जिसको किया खराब,
मां समान है वसुंधरा,
पलते रंक और नवाब।
हरी भरी लहलहायेगी,
मन में उठती है उमंग,
कभी बसंत की बासंती,
कभी लहरें उठती गंग।
अन्न, जल,जीवन देगी,
समा लेती अपने रूप,
समान भाव वो रखती,
सुंदर मुखड़ा या कुरूप।
सोना-चांदी उपजाती,
मन को करती विभोर,
धरती अंबर प्रसन्न हुये,
नाच रहा है मन मोर।।




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