संवेदना
विधा-छंदमुक्त
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संवेदना हुई सुबह,
लगा कोई पास है,
दर्द कभी दूर करे,
कोई सता रहा है।
खेलते खेलते लगा,
कोई याद कर रहा,
कोई नजर न आये
कैसा भ्रम दिल का।
फूलों की सुगंध से,
लगा यहां छुपा होगा,
ढूंढा वहां नहीं मिला,
फिर हो गया भ्रमित।
संवेदना दे जाती कभी,
मन को भारी एक दर्द,
इनके आगे नतमस्तक,
और कुछ कर न पायें।।
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कैसे कैसे दिन देखे हैं
विधा-गीत
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कैसे कैसे दिन देखे हैं,
दर्द में गाये मिलकर गीत,
कितने अपने साथी छूटे
दुख दे गये कितने ही मीत।।
कैसे कैसे.....................
कोरोना की मार पड़ी तो,
छुपकर बैठ गये घर अंदर,
दिन रात को सोचते रहते
कैसी देखी जगत की रीत,
कैसे कैसे.....................
खाना खाया सोच सोचकर,
छुपकर बैठे अपने घर में,
मिलना जुलना भूल गये हम,
मन ही मन में गा रहे गीत,
कैसे कैसे....................
रात चैन नहीं दिन को चैन,
डर लगे कोरोना दिन रैन
सूखी रोटी डर डर खाई
भूले यहां सारी ही प्रीत,
कैसे कैसे.....................
कैसे कैसे दिन देखे हैं,
दर्द में गाये मिलकर गीत,
कितने अपने साथी छूटे
दुख दे गये कितने ही मीत।।
कैसे कैसे.....................
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गीत
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पुल/सेतु
विधा-गीत
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आज के इंसान का,
रवैया हो गया ढुलमुल,
अपनी ही बातों का,
खुद बना रहे हैं पुल।
रामसेतु जब बनाया,
राम के काम आया,
बज रहा है बिगुल
वाह,वाह,वाह,पुल।
आज का बुरा दौर
बन गये कितने चोर,
कितने बन गये केतू,
वाह! बना सुंदर सेतू।
खा रहे हैं माल कुछ
बन गये हैं कितने पेटू,
अब कौन बनाता है,
श्रीराम जैसा वो सेतू।
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अभिव्यक्ति
विधा-छंदकविता
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अभिव्यक्ति है कठिन,
ले कोई मन में ठान,
एक दिन सफल होगा,
प्रयास सदा चाहिये।
बढिय़ा हो अभिव्यक्ति,
जीवन होता है सफल,
प्रयास करो सदा अपना,
कहते आये हैं बुजुर्ग ।
अभिव्यक्ति से न डरो
बेहतर जरिया होता है,
जिसमें यह गुण नहीं,
फेल होगा संसार में।
शब्द-ब्रह्मा
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ब्रह्मा देते जिंदगी, महेश पालनहार।
नारायण रक्षक बने, करें सभी से प्यार।।
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दोहा
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जीत चेहरे पर सजे, शिकन नहीं है हार।
जिंदा रहना जगत में, कर अपनों से प्यार।।
सजे नहीं जब तन कभी, जाते नहीं स्कूल।
युवा वर्ग है अब दुखी, करते हैं वो भूल।।
पापी ढोंगी बढ़ रहे, करते अत्याचार।
लोग अधर्मी चाहते, इन लोगों का प्यार।।



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