Thursday, December 17, 2020

राजनीति और जनता/
कविता
*********************

****************************

****************************
राजनीति हुई कलुषित,
नेता बन चुके हैं मलंग,
अपनी मनमर्जी वो करे,
जनता हो चुकी है तंग।

राजनीति समझ न पाये,
जनता को खेल खिलाए,
अपनी जेब भरते धन से,
जनता को जमके रुलाये।

राजनीति का खेल बुरा,
पल में करे रास्ता साफ,
करते लाख गुनाह पर्दे,
फिर भी हो जाते माफ।

राजनीति सदा बातों की,
बातों से जनता को मारे,
अपना वेतन नेता बढ़ाते,
कर्मचारी फिरते मारे मारे।

राजनीति मिले गूढ़ बहुत,
आम जन समझ ना पाये,
जिससे बदला लेना होता,
उसको नेता बहुत सताये।

चाणक्य विद्वान हुये जगत,
राजनीति का खेल दिखाया,
मौर्य के महामंत्री बनके ही,
नंद वंश का नाश करवाया।

दुनिया के श्रेष्ठ  देव बनकर,
श्रीकृष्ण जब खेल खिलाये,
महाभारत का युद्ध हुआ था,
झूठे स्वार्थी समूल मिटवाये।

नीति- राजनीति के वे ज्ञाता,
विदुर नाम विद्वान कहलाये,
अपनी  रणनीति दिखलाकर,
सबके जन मन को वो हर्षाये।

राजनीति कहाती एक चक्की,
जनता जिस में पिसती जाये,
राजनीतिज्ञों के आगे देख लो,
दुनिया कितनी यूं गिड़गिड़ाये।

राजनीति एक खोटा सिक्का,
नहीं पता वो कब चल जाये,
बम पटाखे सी फटती कभी,
एक अंगुली पर जन नचाये।

किसान,कर्मी,ज्ञाता,साधु संत,
सब मिलते राजनीति के मारे,
राजनीति में मिलते हैं दुश्मन,
लगते कभी वो जन को प्यारे।

राजनीति का हो खेल अनोखा,
ना समझ पाती ये जनता सारी,
जनता का वोट पाते हैं ये नेता,
फिर भी जनता नेता की मारी।

हजारों सालों से शोध हो रहे,
राजनीति समझ नहीं पाया है,
राजनीति की मार झेल झेलके,
यह संधिकाल अब आया है।

एक सिक्के के दो पहलु मिले,
एक राजनीति व दूजे समाज,
बेशक लाख बुरी है राजनीति,
नेता को राजनीति पर हो नाज।

झूठ बोलकर जन बना पागल,
बेशकीमती जो  वोट पा लेता,
जन जन का वो बनता है प्रिय,
कहलाता मर्मज्ञ,वेत्ता ज्ञाता नेता।।
*********************
सूर्य/दिनकर
विधा-दोहा
****************

भोर सुहानी देखकर, मन में उठी उमंग।
उदित सूर्य ने छेड़ दी, रात दिवस की जंग।।

सूर्य को अघ्र्य दे रहे, करे देव को याद।
पितर पक्ष अब चल रहे,बस उनसे फरियाद।।

सूरज, पृथ्वी सीध में, हिमकर आये बीच।
सूर्य ग्रहण होत है, वो दिन बनता नीच।।

दानी वैसा हो नहीं, कर्ण नाम ले जान।
कौरव सेना में लड़े,  सूर्य पुत्र पहचान।।






आँगन की चारपाई/बरोठे
विधा-कविता
****************
आँगन की चारपाई,
बुजुर्ग के काम आई,
पटक देते बुजुर्ग को,
लेते रहते हैं जम्हाई।

आँगन की चारपाई,
बैठा ताऊ और ताई,
सोच रहे संसार की,
कैसी बुरी घड़ी आई।

आँगन की चारपाई,
मार रही पड़ी दुहाई,
चारपाई के दिन गये,
घर में पलंग मंगवाई।

आँगन की चारपाई,
करती नहीं रुसवाई,
जन-जन सेवा करे,
होती नहीं है हँसाई।
*********************

No comments: