हम हार नहीं सकते
विधा-कविता
************
*********************
*********************
जीत का हौसला बुलंद,
अपना भाग्य खुद लिखे,
हम व्यर्थ बात न बकते,
हम तो हार नहीं सकते।
आसमान से ऊंचे इरादे,
परमाणु से सूक्ष्म कहाते,
मन में गर जो ठान लेते,
वो काम करके दिखाते।
भागीरथ जैसे गंगा लाते,
भला करे नहीं पछताते,
बुजुर्गों का हित करते हैं,
भूले भटके राह दिखाते।
दधिच जैसे दानी हैं हम,
कल्पना सम विज्ञानी हम,
पाताल से भी खोज लाते,
हनुमान प्रभु से ज्ञान पाते।
सिकंदर आये हारकर जाये,
पृथ्वीराज से साहसी हैं हम,
मुकाबला करके देख लेना,
अगर किसी में मिलता दम।।
*******************
कविता
****************
इंसान की जिंदगी अब,
लो रेत का दरिया बनी,
जल दूर तक नहीं लगे,
कष्ट मन को देती घनी।
इंसान ने अपने ही हाथ,
ये दिन भी दिखला दिये,
पेड़ -पौधे काट काटकर,
रेत सम हँसी क्षण किये।
हरी भरी धरा होती थी,
आज निज हाथों बर्बाद,
जिंदगी जब नहीं रहेगी,
अंतिम समय आये याद।
बचाना होगा इस धरती,
ये मातृभूमि कहलाती है,
कभी खुशी कभी गम में,
यह रह रहकर सताती है।।
बंधन
विधा-कविता
*********************
पैदा होता इंसान सदा,
इस धरती पर आजाद,
पर बंधन में मिलता है,
करता फिरता फरियाद।
जहां भी जाये बंधन है,
यह कैसी आजादी पाई,
कभी रो रोकर गुजार दे,
कभी जगत में हो हँसाई।
बंधनमुक्त हो जाता जन,
कभी मृत्युलोक में जाये,
जीवन में जीते जी रहता,
कभी रोये कभी हँसाये।।
दबे पांव फिर आई सर्दी
विधा-कविता
*********************
************
दबे पांव फिर आई,
चहुं ओर शोर सर्दी,
किसे सुनाये दुखड़ा,
किसे लगाये अर्जी।
सरसों, गेहूं खड़ी हैं
उस पर पड़े कोहरा
नील गाय चट करती
नष्ट कृषक का ठोरा,
कहीं आवारा गाएं हैं
कहीं सुअर व बंदर
कहीं चूहे व गिलहरी
चर्चा हो रही घर घर,
गरीब होता किसान
पहुंचाते हैं जीव हानि
एक एक पैसा जोड़ता
ना करो तुम मनमानी।
बढ़ गई सर्दी और धुंध
किटकिटाने लगे हैं दांत
ऊनी वस्त्रों की बहार है
ढके हुए तन और हाथ।
ओस पढ़ी घास फूस पर
लग रही जैसे कोई मोती
गर्म चाय और पानी लगे
अच्छी लगती गर्म रोटी।
रात हुई सुनसान हो जाए
सड़क मार्ग पर धुंध छाए
गर्म वस्त्रों में लगते मोटे
मूंगफली सभी को लुभाए।
रबी फसल के लिए आए
सर्दी का मौसम मदमाता
तीन माह जाड़ों के होते
फिर मौसम गर्मी का आता।
नमन **********************
***********************
कर्ज कभी मत भूलिये, दिल से रखना याद।
मात पिता और गुरु से, करो सदा फरियाद।।
सत्य कथन वो मानिये, जिसको मानते लोग।
झूठ बोलना आज दिन, बना नासूर रोग।।
आलिंगन वो कर रहे, उसे प्रेम रस मान।
सत्य झूठ को मानते , कितने हैं नादान।।



No comments:
Post a Comment