दोहा****************
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आसमान भी रो रहा, धरती कष्ट हजार।
बारिश जब हो झूमकर, बढ़े जहां में प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़ हरियाणा
दोहा****************
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गैरत जिनकी मर चुकी, जीना है बेकार।
गिरे हुये हैं मानते, नहीं मिले जन प्यार।।
पिता देव आकाश सम, बच्चों का आधार।
कष्ट रात दिन झेलता, देता अनमिट प्यार।।
पिता कमाता रोटियां, मिले नहीं आराम।
सोच रहा निश जागकर, पूरे करता काम।।
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दोहा शब्द-गैरत
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गैरत जिनकी मर चुकी, जीना है बेकार।
गिरे हुये हैं मानते, नहीं मिले जन प्यार।।
कुंडलियां *******************
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खाना मिलता देश में, करके मेहनत रोज।
होटल में दावत उड़े, करते नेता मौज।।
करते नेता मौज, कृषक आंदोलन करते।
उनकी सुनता कौन, बैठ सड़कों पर मरते।।
शुरू किया सरकार,बिलों का लाभ बताना ।
हलधर का आधार, सिर्फ लंगर का खाना ।।
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नाराज हो मुझसे
विधा-कविता
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खपा खपा लगते हो,
बस शिकायत तुझसे,
मुंह चिढ़ा बात करते
क्यों नाराज हो मुझसे?
बस यूं ही बात करते,
फुरसत क्षणों में तुझसे,
वादों पर खरा उतरा हूं,
क्यों नाराज हो मुझसे?
कभी झगड़ा ना हुआ,
शिकायत नहीं तुझसे,
बातें नहीं कर रहे हो,
क्यों नाराज हो मुझसे?
कभी दिल दुखाया ना,
हँसकर बातें की तुझसे,
मुंह फेर लेते मिलने पर,
क्यों नाराज हो मुझसे?
साथ साथ चलते आये,
दूर ना हुये कभी तुझसे,
बातें करना गवारा नहीं,
क्यों नाराज हो मुझसे?
जब भी कष्ट मिला है,
पुकारा बस मैंने तुझको,
पर अब वो बात नहीं,
क्यों नाराज हो मुझसे?
साथ खाना खाया हमें,
खपा नहीं कभी तुझसे,
तुम अलग राह चलती,
क्यों नाराज हो मुझसे?
रात दिन तुझे चाहा था,
मुहब्बत बड़ी थी तुझसे,
दूर दूर छुपकर रहते हो,
क्यों नाराज हो मुझसे?
खेल अधूरा छोड़ों ना,
यह प्रार्थना बसु तुझसे,
अच्छा नहीं लगता यह,
क्यों नाराज हो मुझसे?
जग तमाशा देख रहा,
यकीन बड़ा था तुझसे,
जग तमाशा बन चुका,
क्यों नाराज हो मुझसे?
मन में बहुत इतराते थे,
पाकर प्यार बस तुझसे,
वादे सारे तोड़ दिये हैं,
क्यों नाराज हो मुझसे?
कोई किसी का नहीं हैं,
यह समझाता मैं तुझसे,
आकर मुझको आजमा,
क्यों नाराज हो मुझसे?
बहुत बेदर्द जमाना हो,
यकीन मिला था तुझसे,
बस खाक छान रहे हैं,
क्यों नाराज हो मुझसे?
जिंदगी आनी जानी है,
पर दर्द मिला है तुझसे,
अब ना और मुझे सता,
क्यों नाराज हो मुझसे?
नाराजगी अब दूर कर,
फिर गले मिलूं तुझसे,
बांहों में बस आ जाना,
क्यों नाराज हो मुझसे?
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नियति
विधा-चौका
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पड़ती ठंड
शांत हो गई धरा
कैसी नियति
लगता जन डरा
बदली मति
खो गया रंग हरा
किसको कहे
लगता सब नया
आती ना दया
कैसे करूं मैं बयां
उसके आगे
नतमस्तक होते
जीवन नया
मिलता अब कहां
स्वर्ग नरक यहां।






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