क्या कहूं अब तुझसे
विधा-कविता
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वो दिन आएंगे नहीं,
देखे थे सपने मुझ से,
बीती बातें याद आए,
क्या कहूं अब तुझसे?
सात फेरे लिये अग्रि,
वादे किये थे मुझ से,
भूल रही हो तुम सारे,
क्या कहूं अब तुझसे?
हसीन सपने दिखाके,
बातें ना करती मुझसे,
किस्मत का दोष मेरा,
क्या कहूं अब तुझसे?
बातों से ही प्रेम हुआ,
प्रसन्न थी तुम मुझ से,
नाराज आज बैठी हो,
क्या कहूं अब तुझ से?
चाहत सारी असफल,
दर्द दे गई तुम मुझसे,
हुई खता क्या मेरी है,
क्या कहूं अब तुझ से?
रातों की तनहाइयों में,
प्यार करती हो मुझसे,
पहलु में क्यों न आती,
क्या कहूं अब तुझ से?
लाख मनाया है तुझको,
आंखें चुराती हो मुझसे,
छुप छुपके बातें करती,
क्या कहूं अब तुझ से?
बहुत खत लिखे तुमने,
अब रूह तोड़ती मुझसे,
बुरा ना कभी किया था,
क्या कहूं अब तुझ से?
ख्वाबों में खोई रही हो,
चाहत रही तेरी मुझ से,
डरकर अब दूर भागती,
क्या कहूं अब तुझ से?
कभी पास आती थी,
अब दूर रहती मुझसे,
धोखा देकर चली गई,
क्या कहूं अब तुझसे?
नाता जोडऩा चाहा था,
दूर चली गई हो मुझसे,
वादे पर खरा उतरा था,
क्या कहूं अब तुझ से?
खेल खेलकर दर्द दिया,
बातें करके तुमने मुझसे,
अब शर्म लिहाज भूली
क्या कहूं अब तुझ से?
साथ रहने का वादा था,
अब दूर हो गई मुझ से,
दिल से खेलती हो तुम,
क्या कहूं अब तुझ से?
तुमने किया ठीक नहीं,
बदला लिया है मुझसे,
पर क्यों सजा दी मुझे,
क्या कहूं अब तुझ से?
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पथिक
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अनंत राहों पर चले, जाना सागर पार।
सच्चे मन से चले, मिले जहां का प्यार।।
डूब जाते हैं राह में, नहीं इरादा हो पक्का,
गिरकर जो न संभले, होगी निश्चित हार।।
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जीवन साथी
विधा-कविता
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ना सुख मिलने वाले चाहे,
रखो भैंस,घोड़ा और हाथी,
सुख जरूर मिलता है जब,
शानदार मिले कोई साथी।
बड़े बड़े धोखा दे देते जब,
पड़ जाएगा छोटा सा काम,
उनके कारनामे सुन सुनकर,
रटते रहना फिर राम श्याम।
जिनका भला लाख करोगे,
वो वक्त पड़े तो बने दुश्मन,
सारी नेकी पल में भूल जा,
बेशक अर्पण करो तन मन।
सोच समझकर कदम बढ़ाए,
जगत में मिलेंगे अल्प अपने,
जब विश्वास काम होने का,
साधना
विधा-हाइकु
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बड़ी साधना
जगत में कहाती
नाम कमाती
करो साधना
होती है आराधना
यही कामना
लीन रहता
जब कोई साधना
पूरी कामना
कहे साधना
करते ही रहना
दर्द सहना
साधना मिले
वांछित जन मान
बनेगी शान।
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विधा-दोहा
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शब्द-नीति
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नीति निपुण वो मानिये, सफल सकल संसार।
कर्म धर्म में हो सफल, मिले जहां का प्यार।।
शब्द-अनीति
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अनीति अत्याचार से, होती जग में हार ।
लाख पाप गर कर रहा, नहीं मिलेगा प्यार।।
शब्द-रीति
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रीति नीति हो जगत में, नेता का ही खेल।
बिना बात जो दर्द दे, नहीं जहां का मेल।।
शब्द-कुरीति
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कुरीति जग की छोड़ दो, बने जगत ही धाम।
मन के विचार शुद्ध हो, होगा जन में नाम।।









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