Sunday, December 06, 2020

गुलाबी ठंड/कविता
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सर्दी सता रही है जन को,
रो रहे लोग, गरीबी मार,
देखो इन गरीब जनों को,
कर लो कभी इनसे प्यार।

प्रभु ने बनाया सबको ही,
लगती है ठंड हर शरीर,
इंसान वहीं कहलाता है,
जो जग की लेता हर पीर।

प्रभु ने बनाया अजब जग,
बना डाला गरीब व अमीर,
गरीब वहीं जो दान नहीं दे,
दानदाता हो जग में अमीर।

दान पुण्य से, पहचान बने,
कह गये कितने जग के संत,
धन दौलत को जोड़ते रहना,
हो जाएगा एक दिन ही अंत।

गुलाबी सर्दी, जब पड़ती है,
पेड़ और पौधे भी जल जाये,
ऐसी पीड़ादायक सर्दी से प्रभु,
हर जीवन को जरूर बचाये।।


नारी और निकेतन
विधा-कविता
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नारी जग आधार है,
मिलना चाहिए प्यार,
घर से बाहर न भेजो,
करना है यह इकरार।

अनाथ और निराश्रित
विधवा और परित्यक्त,
तिरस्कृत जाये निकेतन,
कितना बुरा यह वक्त।

नारी और निकेतन अब,
बन गये हैं दोनों पर्याय,
पर आज के युग में तो,
कहलाएगा जग अन्याय।
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उपकार
विधा-कविता
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उपकार भला संसार में,
सदा करते रहो उपकार,
उपकार के संग में भरा,
लोगों का अपार प्यार।

उपकार करने वाला जन,
कमाता पूरे जगत में नाम,
उपकार करते हैं लोग तो,
याद करें जन सुबह शाम।

उपकार करते हैं पेड़ पौधे,
देते जन को फल व  फूल,
आक्सीजन देते हैं जीने को,
उनका हित करते हैं कबूल।

उपकार किया  भागीरथ ने,
गंगा धरती पर लेकर आया,
अंजुमान, सगर चले गये थे,
भागीरथ ने जग नाम कमाया।
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भूख
विधा-कविता
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भूख बुरी इंसान की,
करवा देती बड़ा पाप,
भूख के सामने बौना,
भूख बन सकती श्राप।

आग पेट की कहलाए,
बढ़े तो समस्या बनती,
खाना नहीं मिले अगर,
आपस में बातें ठनती।

भूख बर्दाश्त नहीं हो,
जब इंसान में बढ़ती,
सब कुछ शून्य लगता,
नशा रूप में ये चढ़ती।

भूख मिटाओ  पहले,
देश बन जाये महान,
भूखे नंगे जहां मिलते,
घटेगी देश की शान।।



 कविता/
कहा गया वो प्यार
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कहां गये वो लोग, कहा गया वो प्यार,
बुजुर्ग देव समान हैं, ऋण इनका उधार।
आसमान भी रोता है,जब जहां से जाते,
इनकी मानवता किस्से, जन को तड़पाते।।

आदर्श जहां में होते हैं, मानव रूप दाता,
खुशनसीब होता वो,इनका प्यार है पाता।
दर्शन मात्र से इनके,कष्ट सभी मिट जाते,
धाम समान होते हैं, ईश्वर रूप इन्हें पाते।।

असली जीवन जीया, सुख सुविधाएं दूर,
मन सलील होता है, नहीं मिलता गरूर।
अनुभव के भरे हुये, कर लो इनकी सेवा,
बस इनकी सेवा से, मिले जहां की मेवा।।

मन,कर्म,वचन से कहे, लोह की लकीर,
धन दौलत से दूर हैं, सच्चे मन के फकीर।
जिस घर में रहते हैं, वो बनता देवालय,
पूरी संस्था समान हो, गुणों के ये आलय।।

आशीर्वाद सदा पाना, करो कभी न भूल,
बिछुड़ गये पछताना हो, चुभता ज्यों शूल।
आओ इनको गले लगाये,फिर न आएंगे,
इनके आदर्श रह रहकर, हमें यूं सताएंगे।।



 







दोहा ****************
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देश  तरक्की  कर  गया , बढ़ा  ज्ञान  विज्ञान ।
कुर्बानी   देकर   मिली , आजादी   की  शान ।।

खूब तरक्की हो रही, भारत देश महान।
पूरे जग में नाम है, बढ़ती जाये शान।।

खूब तरक्की हो रही, बढ़ा ज्ञान विज्ञान।।
मंगल तक भी जा चुका,बनी जगत पहचान।।

खूब तरक्की हो रही, बढ़ा ज्ञान विज्ञान।।
पता लगाया चांद का,भारत की पहचान।।

जा पहुॅंचा वह चांद पर,पाया जग सम्मान।
ज्ञान विज्ञान बढ़ गया, भारत की पहचान।।





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