दोहा
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चेतन मन को जानिये, करे होश में बात।
उसे शराबी मानिये, दिन को कहता रात।।
गुनाह करके ओट में, समझे दामन पाक।
मन मंदिर यूं कह रहा, जीना तेरा खाक।।
भाई भाई लड़ रहे, घटी है प्रेम प्रीत।
ओछे जन से प्यार है, जहां की यहीं रीत।।
निशा होने को है
विधा-मुक्तक
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मुक्तक मात्राभार-29
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निशा होने को है,
दिखलाएगी कोई नया खेल।
कितने रुखसत होंगे,
कितनों से होगा जग में मेल।।
सुख दुख जीवन में,
आते जाते मेहमान की भांति,
होती है कभी भोर,
बन जाती है मानव की रेल।।
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देश की धरती
विधा-छंदमुक्त
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इस धरती ने दिये लाल
लाल,बहादुर, भगत सिंह
मिला था उनको ही सदा,
देश की धरती का प्यार।
लड़ लड़कर वो मर गये,
कर गये देश पर ही नाम,
नहीं भूला पाएगा ये जहां,
बनी है देश की पहचान।
कितने आये चले गये वो,
नहीं मिटा वीरों का नाम,
तूफान बनकर वो आये थे,
दिखा गये लोगों को राह।
आजादी की लड़ाई लड़ी,
पीछे मुड़कर जो न देखते,
उनसे देश आजाद हुआ,
ऐसे वीरों को करो सलाम।
राजनीति और जनता
विधा-कविता
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राजनीति हुई कलुषित,
नेता बन चुके हैं मलंग,
अपनी मनमर्जी वो करे,
जनता हो चुकी है तंग।
राजनीति समझ न पाये,
जनता को खेल खिलाए,
अपनी जेब भरते धन से,
जनता को जमके रुलाये।
राजनीति का खेल बुरा,
पल में करे रास्ता साफ,
करते लाख गुनाह पर्दे,
फिर भी हो जाते माफ।
राजनीति सदा बातों की,
बातों से जनता को मारे,
अपना वेतन नेता बढ़ाते,
कर्मचारी फिरते मारे मारे।
राजनीति मिले गूढ़ बहुत,
आम जन समझ ना पाये,
जिससे बदला लेना होता,
उसको नेता बहुत सताये।
चाणक्य विद्वान हुये जगत,
राजनीति का खेल दिखाया,
मौर्य के महामंत्री बनके ही,
नंद वंश का नाश करवाया।
दुनिया के श्रेष्ठ देव बनकर,
श्रीकृष्ण जब खेल खिलाये,
महाभारत का युद्ध हुआ था,
झूठे स्वार्थी समूल मिटवाये।
नीति- राजनीति के वे ज्ञाता,
विदुर नाम विद्वान कहलाये,
अपनी रणनीति दिखलाकर,
सबके जन मन को वो हर्षाये।
राजनीति कहाती एक चक्की,
जनता जिस में पिसती जाये,
राजनीतिज्ञों के आगे देख लो,
दुनिया कितनी यूं गिड़गिड़ाये।
राजनीति एक खोटा सिक्का,
नहीं पता वो कब चल जाये,
बम पटाखे सी फटती कभी,
एक अंगुली पर जन नचाये।
किसान,कर्मी,ज्ञाता,साधु संत,
सब मिलते राजनीति के मारे,
राजनीति में मिलते हैं दुश्मन,
लगते कभी वो जन को प्यारे।
राजनीति का हो खेल अनोखा,
ना समझ पाती ये जनता सारी,
जनता का वोट पाते हैं ये नेता,
फिर भी जनता नेता की मारी।
हजारों सालों से शोध हो रहे,
राजनीति समझ नहीं पाया है,
राजनीति की मार झेल झेलके,
यह संधिकाल अब आया है।
एक सिक्के के दो पहलु मिले,
एक राजनीति व दूजे समाज,
बेशक लाख बुरी है राजनीति,
नेता को राजनीति पर हो नाज।
झूठ बोलकर जन बना पागल,
बेशकीमती जो वोट पा लेता,
जन जन का वो बनता है प्रिय,
कहलाता मर्मज्ञ,वेत्ता ज्ञाता नेता।।






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