Friday, December 11, 2020

किसान/मुक्तक
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1
आसमां से हो रही, देखों आज बरसात।
किसान प्रसन्न हो रहे, मौसम की क्या बात।।
फसल उगाकर किसान भर रहे अपना पेट,
मेहनत में कसर नहीं, सोता नहीं दिनरात।।
2
जगत का पेट भरे, कहलाता किसान।
पूरे जग में होती, उसकी पहचान।।
बिना परिश्रम लोग, हो जाते शून्य,
किसान होता है जग आन, बान, शान।।
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किसान
विधा-कविता
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कड़ी दुपहरी किसान करे,
निज खेतों की वो तैयारी,
पसीना तड़ तड़ पड़ता है,
घनी वृक्ष छांव लगे प्यारी।

तन पर फटे पुराने कपड़े,
रोटी पानी के लगे लफड़े,
कभी गर्मी में बहे पसीना,
कभी ठंड उसको जकड़े।

हिम्मत नहीं हारे किसान,
घर नहीं बैठे बन मेहमान,
मेहनत कहलाती है शान,
यूं किसान जग में महान।

उसे खुशबू से ना वास्ता,
मेहनत करना एक रास्ता,
मेहनत भी जन रंग लाती,
मन ही मन उसको हँसाती।

खुशबू मानव को ललचाये,
खेत हरियाली जन लुभाये,
बरसे सावन झूम झूम आये,
हसीन सपने किसान हँसाये।

कभी फसल वो पक जाये,
फिर एक सुंदर महक आये,
खुशबू फसल की कहती हैं,
किसान अभी नहीं दूर जाये।

खुशबू खेत की सदा सुहाती,
अकाल पड़े तो उसे रुलाती,
फसल पैदावार घर में डाले,
खुशबू मन तन को इठलाती।।




किसान
विधा-दोहे
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करना कर्म किसान को , छ: ऋतु बारह  मास ।
फिर भी उसे थकान का ,कभी नहीं अहसास ।।

फसल  उगाने  के  लिए , करे रात दिन काम ।
मिलते नहीं किसान को , उसके वाजिब दाम ।।

औला   सूखा   बाढ  से  , नहीं  मानता  हार ।
करता पुन: किसान ले , हिम्मत के हथियार ।।

हरपल  वह रहता जुड़ा , माँ धरती को मान ।
इस खातिर जी जान दे , होता वही किसान ।।

दाता भोजन का यही,हलधर कहो किसान ।
राज  राम  इस  पर  नहीं , होते   मेहरबान ।।

हो जब बारिश खेत में, किसान हो खुशहाल।
जब भी वर्षा हो नहीं,  कृषक बने बदहाल।।

बदतर जग में है कृषक, नहीं मिले आराम।
टूटी चप्पल पहनता,    बने खेत ही धाम।।


गरीबों के बादाम/कविता
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गरीब बेचारे भूखे रहते,
मिलता ना  उन्हें भोजन,
दिनभर मेहनत  करते हैं,
वक्त नहीं है  प्रभु भजन।

गरीबों के आम लगते हैं
पेट भरकर सब  खाते हैं,
गरीबों के  सेव बेर होते ,
बस उनके हिस्से आते हैं।

सर्दी में नहीं बादाम मिले,
ठेले पर मूंगफली मिलती,
मूंगफली जमकर खाते हैं,
ये गरीब बादाम कहाते हैं।

गरीब नसीब  नहीं सोडा
वो बस  मन  बहलाते हैं
मूंगफली वो चाब लेते हैं,
ये ही अमृत कहलाते हैं।





अंधियारे ने खूब निभाई,
           जीवनभर रिश्तेदारी
विधा-गीत
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अँधियारे ने खूब निभाई,
जीवनभर रिश्तेदारी।

अँधियारे ने खूब निभाई,
जीवनभर रिश्तेदारी।
कभी कभी मुझको लगती हैं,
चांदनी रातें भी प्यारी।।

जब बैठकर सोचने लगते,
तन मन मंदिर भी रोता।
सर्दी मौसम मार पड़ती तो,
कैसे कोई जन सोता।।

मेरे मन को आज मिली हैं,
खुशियां अब प्रेम बहाने।
क्यों जिंदगी खराब कर रहे,
लोग लगे मुझे मनाने।।

अँधियारे ने खूब निभाई,
जीवनभर रिश्तेदारी।


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