Tuesday, December 15, 2020

 

जरा सुनो
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आज का विषय-
मेहनत इतनी खामोश हो कि सफलता शोर मचा दे
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मेहनत इतनी खामोश हो कि सफलता शोर मचा दे,
धरने पर जो किसान बैठे, बस उनको आज हँसा दे।
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नमन *******************
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बच्चा लेकर गोद में, माता करती प्यार।
सेवा करती रात दिन, मधुर दूध आहार।।

भरे हुये हैं पाप से, करते उल्टे काम।
दुनिया गाती गीत जब, होता उनका नाम।।

जमकर करते पाप वो, देते जग को दोष।
उठे अंगुली जब कभी, वो दिखलाता रोष।।
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खामोशी
विधा-कविता
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वन उपवन खामोश है,
दे रहे जन को उपदेश,
खामोशी बड़ी बात हो,
स्मृतियां हमारी हैं शेष।

खामोशी में जो रहते हैं,
मन हो उनका विशाल,
उनसे धरा प्रसन्न रहती,
कर देते वो मालामाल।

खामोशी कभी दर्द का,
करती सुंदर सा बखान,
खामोश जब कोई मिले,
बनती उसकी पहचाना।

खामोशी कभी न तोडऩा,
रखती है वो, कुछ राज,
जो मानव खामोश रहता,
उन पर मिलता हमें नाज।  
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नव सृजन
-कविता
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शीत लहर चल रही,
पाले ने बहुत सताया,
सरसों फसल पकी है,
गेहूं बहुत लहलहाया।

नभ में आंशिक बादल,
सूरज करे लुका छिपी,
धुंध छाई है  चहुं ओर,
जिंदगी बनती है फीकी।

हल्की  बूंदाबांदी होती,
आ जाती फसल बहार,
आग सुहानी लगती हैं,
गर्मागर्म  पसंद  आहार।

सर्दी के दिन हो निराले
शरीर कंप कंपाता खूब
स्वेटर,कंबल अच्छे लगे
सुहानी लगती बड़ी धूप।

बढ़ रही दिनोंदिन धुंध,
बनता जा  रहा कोहरा,
सर्दी  का माहौल बढ़ा,
आसमान लगता  गोरा।

सरसों अंगड़ाई ले रही,
गेहूं में आ गई है आब,
पक्षी छुपे बैठे देख रहे,
तरुवर पर आई शबाब।

घास पर जमा है मोती,
सफेद चादर  सी छाई,
गर्मी के दिन बीत गए ,
सर्दी ने ले ली अंगड़ाई।

गर्म चाय  की चुसकी,
और रजाई खूब सुहाए,
मजे से सोते रहते जन,
गर्म हवा खूब लुभाए।।
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समय
विधा-कविता
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पृथ्वी की उत्पत्ति,मानव का हुआ जन्म,
नभ का धरा से मिलता जब समय देखा,
वक्त नहीं रुका चलता जाये ज्यों पहिया,
राजा रानी का मिलन, भाग्य की है रेखा।

इतिहास बदला, राजा आये कितने गये,
क्या क्या जगत में रचे किसने ढोंग नये,
कभी कोई अडिग रहा वाणी पर अपनी,
क्या क्या कष्ट वक्त की मार सच ने सहे।
 
हर वक्त बदलता है, तकदीर बदलती है,
देश बदलता है,  हर तस्वीर बदलती है,
समय कभी नहीं रुका, ना रोका जाएगा,
तारीख गवाही दे, हर दिन नया आएगा।

इतिहास के पन्नों पर, लिखी है दास्तान,
मूक गवाह बनकर, करती वक्त पहचान,
जो चल गये जग से, वो वक्त तारीख है
जो आयेगा जग में, उसकी फिर शान है।

जीना मरना की, एक  निश्चित तारीख है,
समय सदा चलता है,, उसकी तारीफ है,
कोर्ट कचहरी में, जब मिलती तारीख है,
आएगी एक दिन वो,  उसकी तारीफ है।

तारीख पर सारा जग, सिमट ही जाता है,
तारीख नहीं लगती तो, जन दुख पाता है,
मुकरना तारीख है,  तो मिलना बारिश है,
तारीख निशाना है, बस दिल से लगाता है।

वक्त का पहिया, कभी रुका नहीं जग में,
यह कभी नहीं किसी से, यूं रोका जाएगा,
वक्त का पहिया रौंद, सभी को एक दिन,
वापस लौटकर, नया इतिहास बनाएगा।।


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