Thursday, December 10, 2020

 बेटी उपेक्षा,देवी अपेक्षा
 विधा-पद्य
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बुरा वक्त अब आया है,
सुन सुन मन तड़पाया है,
घी घर की कहानी बनी,
बेटी उपेक्षा,देवी अपेक्षा।

ना किसी से आज कम,
बेटी में  होता बड़ा दम,
क्या सोच  जन की हो,
बेटी उपेक्षा,देवी अपेक्षा।

करते मिलते कितने शोर,
पापी निशाचर होते घोर,
मन कुटिल हो अनेकता,
बेटी उपेक्षा,देवी अपेक्षा।

कैसे होगी नैया जग पार,
बेटी से ना जब हो प्यार,
मार पड़े फिरे वो सेकता,
बेटी उपेक्षा,देवी अपेक्षा।।
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मकर संक्रांति
विधा-कविता
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त्योहार अनोखा कहलाए,
मकर  संक्रांति जब आए,
धर्म पुण्य में लग जाते हैं,
गजक,रेवड़ी खूब लुभाए।

उत्तरायण का पर्व अनोखा,
सूर्यदेव बदल लेता दिशा,
बूढ़ों को  जगाने की प्रथा,
रिवाज दिल दिल में बसा।

भीष्म पितामह प्राण त्यागे,
तभी से दान पुण्य करते हैं,
गौमाता  की सेवा कर लो,
पाप कर्म यहां क्यों करते हैं।

परंपराएं चलती ही रहती हैं,
इंसान जग में आएंगे जाएंगे,
बुजुर्ग हमें जो रास्ता दिखाएं,
उन रास्तों में फूल बिछाएंगे।

आग के पास बैठक खुश हो,
भूल रहे जन इस पुराने पर्व,
याद करे बुजुर्गों को लो अब,
मनाएं मिलकर तो होगा गर्व।
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मन
विधा-क्षणिका
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1
मन हुआ बावरा,
घूमे जैसे हो मोर,
कभी रात पसंद है,
कभी सुहाये भोर।।

2
मन की चाहत,
प्यार का दर्द,
बागों में बहार,
हवाएं सर्द सर्द।।
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ख्वाहिशें अब और नहीं बची
विधा-कविता
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संत सा जीवन जी रहे,
कैसी लीला प्रभु रची,
ख्वाहिशें मन में पाली,
परंतु अब नहीं बची।

एकाएक खत्म हुई हैं,
पाकर हमने खो डाली
प्रभु की लीला देखी हैं,
पेड़ तोड़ा, फिर डाली।

क्या-क्या थी ख्वाहिशें
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जन्म लिया इंसान ने
होती जीने की आस,
ख्वाहिश हो जन की
धन-दौलत हो पास।

सुंदर हो एक बंगला
नौकर करते हो काम,
दूर दराज तक देश में,
अपना भी फैले नाम।

घर में जब मैं जाऊगा,
आगे पीछे सब नौकर,
चाय मेज पर रखी हो
जब उठता मैं सोकर।

सुंदर सी एक बीवी हो,
सेवा करती हो दिनरात,
ख्वाहिश होती दिल की
आये नहीं दुख की रात।

घर में दूध, घी ,मक्खन,
बने घर विभिन्न पकवान,
जगत में  फैले नाम मेरा
शाही ठाठ बाट व शान।

पढ़े लिखे घर हो बच्चे,
गाये हर दिन गीता सार,
ख्वाहिश मेरे  दिल की,
घोड़े सैर को मिले तैयार।

लंबा चौड़ा खेत हो मेरा,
चारों ओर महके गुलाब,
ख्वाहिश मेरे दिल की है
यूं महकता मिले शबाब।

धन दौलत के भंडार हो,
गाये ये पक्षी राग मल्हार,
बारिश रिमझिम पड़ रही
पले पूरे जगत का प्यार।

पहनने को नये वस्त्र हो,
मिलने आये दोस्त हजार,
ख्वाहिशें पूरी कैसे होंगी,
बढ़ता ही जायेगा खुमार।

आयेगा फिर वो सवेरा,
संकट सारे हो जाए दूर,
ख्वाहिशें दिल की मिटे
नहीं रहेगा फिर गरूर।।  

कैसे खत्म हुई ख्वाहिशें
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सुंदर मेरा चेहरा होता,
डसा नाग ने मेरा अंग,
तन डाक्टरों ने बचाया,
काला पड़ा है मेरा रंग।

सुंदर सी भार्या मिली,
आठ वर्ष  साथ दिया,
छोड़ गई मझधार मुझे,
बिछुडऩे का गम पिया।

जमकर शिक्षा पाई थी,
नौकरी मुझे नहीं मिली,
रो रोकर जिंदगी बीती,
खिली नहीं दिल कली।

मात पिता जल्दी छीने,
किसको अब दोष देते,
प्रभु की लीला समझी,
जो मिले वो खा लेते।

आज नहीं कर सकता,
किसी से भी फरमाइशें,
इसलिये अब कोई नहीं,
बची हैं जगत ख्वाहिशें।।




-दोहा मुक्तक छंद
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पतझड़ भी प्यारा लगे,मन के खिलते फूल।
तरुवर के उपकार को,कभी न जाना भूल।।
जीवन में कांटे मिले, तन मन भर दे दर्द।
खुशी गमों का मेल हैं, दोनों करो कबूल।।

उपवन में जब झांकते, नाच रहे हैं मोर।
शब्द मधुर वो बोलते, मन को करे विभोर।।
कहीं भंवरे शोर में, मन में उठे उमंग।
छुप छुप बातें कर रहे, इधर उधर चितचोर।।
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दोहा
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कर लो बेशक पाप तुम, रखता वही हिसाब।
अंत समय जब पास हो, घट जाएगी आब।।

मंत्र मुग्ध जन कर सको, दो ऐसा व्याख्यान।
अपनी वाणी ओज से, बने देश पहचान।।

हरियाली मन चूमती, रंग बिरंगे फूल।
पतझड़ मौसम देखकर,लगे धूल में शूल।।

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