Thursday, June 04, 2020

कविता
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जीवनभर बेटी कमाती है
बेटियां घर को सजाती है
दुनिया बहुत रोती हैं जब
बेटी घर पैदा हो जाती है।
मां-बाप की  सेवा करती
बस जमाने से थोड़ा डरती,
जब ससुराल जाती  है तो
सास ससुर के कष्ट हरती।
पीहर में मायके की चिंता
मायके में पीहर भी सताता,
दो घरों का सजाती बेेेेेेेेेेेेेेेेेेेटियां
दाता उसे देखके मुस्कुराता।
जब ढहाती  कहर उस पर
जाती है जब कभी ससुराल,
दान दहेज ढो ढोकर बेचारी
जिंदगी में होती  वो लाचार।
नाम कमाती जगत में बेटियां
सीता,सवित्री, इंदिरा,कल्पना,
हे जगत पिता उन्हें दे जीवन
उनका भी होता कोई सपना।।
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*होशियार सिंह यादव




-चाणक्य
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धरा ज्ञान की खान है, ज्यों चाणक्य महान।
बुद्धिमान की कर कदर, बने देश पहचान।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना, हरियाणा

चाणक्य
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धरा ज्ञान की खान है, ज्यों चाणक्य महान।
बुद्धिमान की कर कद्र, बने देश पहचान।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना, हरियाणा

जरा सुनो
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चेहरे की कद्र होती है गुणों को भुला दिया जाता है, जिस दिन गुणों की कद्र होगी तवा(रोटी सेकने का) भी नाम कमायेगा।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना, हरियाणा

पर्वत
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नाले नदियां हैं जहां, होती हैं ये शान।
धरती की हैं संपदा, इनसे देश महान।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना, हरियाणा



दोहा नंबर-04
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चोरी का डर भूल जा, ले लो शिक्षा ज्ञान।
वक्त पड़े तो काम दे,  मत रहना अज्ञान।।
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स्वरचित मौलिक रचना
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*होशियार सिंह यादव


घर के अंदर ही रहो, कोरोना की आड़।
बच्चे तकते अब थके, लगी हुई है बाड़।।

पढ़ाई लिखाई से बने, बिगड़े सारे काम।
फिर तो शिक्षा पाइये, सुंदर होता धाम।।


प्रथम किस्त
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1
होरी की टोली चली, बिखरे रंग गुलाल।
भंग पिये बिन हो नशा, बुरा हो गया हाल।।   
2
गलत समय आहार ले, हो जाये बीमार।
चटनी, रोटी, दूध से,करो सदा ही प्यार।।
3
रस गिलोय पीयूष सम,तन का मिटे बुखार।
निस दिन काढ़ा पान कर,उर के हटें विकार।
  
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*होशियार सिंह यादव

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