सुनो
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पाप के यौवन पर जाने के बाद पुण्य, दुख की पराकाष्ठा के बाद सुख, हानि के बाद लाभ की पुनर्वावृत्ति होती है।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,हरियाणा
दोहा
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धर्म, कर्म जग से घटे, पाप, दोष का शोर।
जनहित की जो सोचते, वे जन के सिरमोर।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
नमन दोहा ****************************
बहुत दर्द में जी रहा, इस जग का इंसान।
अपने घर में कैद है, रोग, दोष पहचान ।।
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धर्म, कर्म जग से घटे, पाप, दोष का शोर।
जनहित की जो सोचते, हर जन के सिरमोर।।
-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
शब्द-दादुर
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दादुर जल, थल पर मिले, छेड़े सुंदर तान।
बारिश की पहचान है, इनका सुंदर गान।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
नमन दोहा धुरंधर
शब्द-संजीवनी
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द्रोण अचल जगमग करे, सुन मारुति अरदास।
संजीवनी समझ गिरी, लाये प्रभु के पास।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
मेरा दर्द
विधा-पद्य(कविता)
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बुढ़ापा बैरी आ गया,खूब बढ़ गया दर्द,
खाना पीना कठिन हुआ, कभी मारे सर्द,
बच्चों की चिंता बढ़ी, हो गये हैं खुदगर्ज,
आज असहाय लग रहा, हट्टा कट्टा मर्द।
दांत काम नहीं करते, मन करता मीठे का,
नहाना धोना मुश्किल, शैंपू मिले रीठे का,
पत्नी खुद दर्द में रहती, कोई न जाने मर्ज,
ज्यों ज्यों बुढ़ापा आया,बढ़ गया मेरा दर्द।
याद आता बचपन सुहाना,याद है जवानी,
क्या लुत्फ उठाते थे, किया करते मनमानी,
हाथों पर रखे मां बाप, निभाया निज फर्ज,
बेटे, पोते किसके होते, जनते ना मेरा दर्द।
आती हैं पुरानी यादें, क्या क्या करते खेल,
दोस्त,साथी,सगे रहते, होता था सुंदर मेल,
अब बुढ़ापा बैरी आया, लगे जैसे हो जेल,
कोट पेंट पहनते थे, भूल गये खुशबू तेल।
ये दर्द किसी में न आये, सता रहा हजार,
घर में कैद रहकर अब, जीवन है बेकार,
चाहते हुये प्रभु न उठाये, दर्द का खुमार,
जैसे भी जीवन अब बीते,सुविधा दो चार।।
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पाप के यौवन पर जाने के बाद पुण्य, दुख की पराकाष्ठा के बाद सुख, हानि के बाद लाभ की पुनर्वावृत्ति होती है।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,हरियाणा
दोहा
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धर्म, कर्म जग से घटे, पाप, दोष का शोर।
जनहित की जो सोचते, वे जन के सिरमोर।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
नमन दोहा ****************************
बहुत दर्द में जी रहा, इस जग का इंसान।
अपने घर में कैद है, रोग, दोष पहचान ।।
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धर्म, कर्म जग से घटे, पाप, दोष का शोर।
जनहित की जो सोचते, हर जन के सिरमोर।।
-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
शब्द-दादुर
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दादुर जल, थल पर मिले, छेड़े सुंदर तान।
बारिश की पहचान है, इनका सुंदर गान।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
नमन दोहा धुरंधर
शब्द-संजीवनी
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द्रोण अचल जगमग करे, सुन मारुति अरदास।
संजीवनी समझ गिरी, लाये प्रभु के पास।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
मेरा दर्द
विधा-पद्य(कविता)
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बुढ़ापा बैरी आ गया,खूब बढ़ गया दर्द,
खाना पीना कठिन हुआ, कभी मारे सर्द,
बच्चों की चिंता बढ़ी, हो गये हैं खुदगर्ज,
आज असहाय लग रहा, हट्टा कट्टा मर्द।
दांत काम नहीं करते, मन करता मीठे का,
नहाना धोना मुश्किल, शैंपू मिले रीठे का,
पत्नी खुद दर्द में रहती, कोई न जाने मर्ज,
ज्यों ज्यों बुढ़ापा आया,बढ़ गया मेरा दर्द।
याद आता बचपन सुहाना,याद है जवानी,
क्या लुत्फ उठाते थे, किया करते मनमानी,
हाथों पर रखे मां बाप, निभाया निज फर्ज,
बेटे, पोते किसके होते, जनते ना मेरा दर्द।
आती हैं पुरानी यादें, क्या क्या करते खेल,
दोस्त,साथी,सगे रहते, होता था सुंदर मेल,
अब बुढ़ापा बैरी आया, लगे जैसे हो जेल,
कोट पेंट पहनते थे, भूल गये खुशबू तेल।
ये दर्द किसी में न आये, सता रहा हजार,
घर में कैद रहकर अब, जीवन है बेकार,
चाहते हुये प्रभु न उठाये, दर्द का खुमार,
जैसे भी जीवन अब बीते,सुविधा दो चार।।




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