दोहा
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1.
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चोरी का डर भूल जा, ले लो शिक्षा ज्ञान।
वक्त पड़े तो काम दे, मत रहना अज्ञान।।
2.
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साधु संत वो देव हैं, देते जग को ज्ञान।
जन मन के दुख को हरे, नहीं मिले अभिमान।।
3.
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जन की गुण से हो कद्र, जाति कभी ना जान।
निर्गुण कोई ना रहे, गुण है जन की शान।।
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*होशियार सिंह यादव
बेटियां
विधा-छंद
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1.
बेटियां अब आगे हैं, बेटों से नहीं कम।
देश सेवा खातिर वो, बन जाती कभी बम।
बन जाती कभी बम, तन सेवा में लगाती।
मां -बाप की सेवा, कभी ससुराल बिताती।
सर्दी कभी गर्मी, पकानी पड़े रोटियां।
किसी से कम नहीं, भारत की ये बेटियां।।
2.
ध्यान देते बेटों पर, बेटियां पाती दुख।
अच्छा खाना मिलेगा, मिले जग सारे सुख।
मिले जग सारे सुख, वो जग बेटे कहाते।
मां बाप को न रखे, उनको दोस्त सुहाते।
फिर भी बेटे प्यारे, कहलाते हैं जग शान।
अभी वक्त है सोच, लगा बेटियों पर ध्यान।।
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कविता
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निरीह जीवों की कर हत्या
इंसान समझता है बुद्धिमान,
वन्य जीवों की हत्या करके
बढ़ता ही जाये जन अज्ञान।
हथिनी गर्भवती थी उस पर
एक नहीं किये दो-दो पाप,
नरक में ठोर नहीं उसको
कई जन्मों तक लगेगा श्राप।
तिल-तिल कर मरता जीव
तड़प उसकी किसने जानी,
खाना पीना भी खत्म हुआ
प्राणों की दे गई बलिदानी।
स्वर्ग बैठी देगी आत्मा श्राप
बच नहीं पायेगा वो दरिंदा
ओछी सोच एक नीच जन
पूरा भारत ही रहेगा शर्मिंदा।
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1.
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चोरी का डर भूल जा, ले लो शिक्षा ज्ञान।
वक्त पड़े तो काम दे, मत रहना अज्ञान।।
2.
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साधु संत वो देव हैं, देते जग को ज्ञान।
जन मन के दुख को हरे, नहीं मिले अभिमान।।
3.
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जन की गुण से हो कद्र, जाति कभी ना जान।
निर्गुण कोई ना रहे, गुण है जन की शान।।
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*होशियार सिंह यादव
बेटियां
विधा-छंद
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1.
बेटियां अब आगे हैं, बेटों से नहीं कम।
देश सेवा खातिर वो, बन जाती कभी बम।
बन जाती कभी बम, तन सेवा में लगाती।
मां -बाप की सेवा, कभी ससुराल बिताती।
सर्दी कभी गर्मी, पकानी पड़े रोटियां।
किसी से कम नहीं, भारत की ये बेटियां।।
2.
ध्यान देते बेटों पर, बेटियां पाती दुख।
अच्छा खाना मिलेगा, मिले जग सारे सुख।
मिले जग सारे सुख, वो जग बेटे कहाते।
मां बाप को न रखे, उनको दोस्त सुहाते।
फिर भी बेटे प्यारे, कहलाते हैं जग शान।
अभी वक्त है सोच, लगा बेटियों पर ध्यान।।
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कविता
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निरीह जीवों की कर हत्या
इंसान समझता है बुद्धिमान,
वन्य जीवों की हत्या करके
बढ़ता ही जाये जन अज्ञान।
हथिनी गर्भवती थी उस पर
एक नहीं किये दो-दो पाप,
नरक में ठोर नहीं उसको
कई जन्मों तक लगेगा श्राप।
तिल-तिल कर मरता जीव
तड़प उसकी किसने जानी,
खाना पीना भी खत्म हुआ
प्राणों की दे गई बलिदानी।
स्वर्ग बैठी देगी आत्मा श्राप
बच नहीं पायेगा वो दरिंदा
ओछी सोच एक नीच जन
पूरा भारत ही रहेगा शर्मिंदा।
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