गीत
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कुर्सी की माया
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कुर्सी की माया बड़ी निराली,
नहीं मिले फिर देते गाली,
कुर्सी की माया बड़ी निराली,
नहीं मिले फिर देते गाली।....
हाथ जोड़ते पैर पकड़ के
पा लेते हैं कुर्सी
पांच साल फिर न पूछे
हंसी खुशी हो
या मातमपुर्सी।
दूर बैठ खुशी मनाते
बजाते हैं बस ताली,
कुर्सी की माया.......
जब कुर्सी न मिले तो
नाराज होते झटपट,
घर हो या सदन हो
बजा देते हैं लट्ठ
दिन में भी वो रोते हैं
रातें होती है काली
कुर्सी की माया.....
कुर्सी जब तक पास में
भर लेते तिजोरी
अपने रसूख के बल पर
नौकरी करे छोरा छोरी
देखो कितने नेताओं ने
कितनी लूट मचाई ली
कुर्सी की........
जनसेवा को भूल गए
अब अपनी सेवा चाहते
इसलिए भागदौड़ सब
कुर्सी को सब पाते
कुर्सी पा पा कर नेता
कितनी नाम कमा ली,
कुर्सी की माया....
कुर्सी की माया बड़ी निराली,
नहीं मिले फिर देते गाली,
कुर्सी की माया बड़ी निराली,
नहीं मिले फिर देते गाली।....
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*होशियार सिंह यादव
कलाधर छंद
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खेत का हुआ हुई फसलें सब तबाह और
आस पास खेत भी लगे ज्यों बिना फसले,
देश के किसान शान मिले मिट्टी में दबे
कौन खेत जोत कर सजाये रोज फसले,
राज काज का क्या करते जैसे बड़ा शोर
कौन अब देगा लेगा सुध किसान फसलें,
सदा अदा कदा ही मिला किसान अन्न और
कैसे अब रहे क्या कौन उगाता हैं फसलें।।
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*होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़ हरियाणा
कान्हा मुरली मन भाये।
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गोपियां विभोर हुई,
राधिका नाच उठी,
नृत्य कर रहे मोर,
मच उठा एक शोर,
कान्हा मुरली मन भाये।
मीरा भी खो गई
सुख चैन में सो गई,
बादल करे घनघोर,
जग हुआ विभोर,
कान्हा मुरली मन भाये।
कौरव हार गये,
पांडव गये जीत,
कृष्ण सखा बांसुरी
कर रही है प्रीत,
कान्हा मुरली मन भाये।
जग को हंसा दिया,
दुष्टों को रुला दिया,
वक्त की हुई जीत,
गाये दुनिया यह गीत,
कान्हा मुरली मन भाये।
जरा सुनो
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ख्वाब देखना बुरी बात नहीं है किंतु झोपड़ी को छोड़कर महलों के ख्वाब देखते देखते कहीं झोपड़ी भी न गंवा बैठो, इस बात का ख्याल जरूर रखे।
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--होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़, हरियाणा-
दोहे
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1.
हो जब बारिश खेत में, किसान हो खुशहाल।
जब भी वर्षा हो नहीं, कृषक बने बदहाल।।
2.
सबसे ज्यादा है दुखी, कहते उसे किसान।
धान्य,अनाज पैदा हो, बारिश है पहचान।।
3.
दिनभर करके काम वो, नहीं करे आराम।
फिर गर वर्षा हो नहीं, चले नहीं घर काम।।
4.
खेती का तब काम हो, जग में हो बरसात।
वर्षा किसान देख ले, लगा रहे दिनरात।।

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