इंसान के बदलते रूप
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सजा धजा बाहर से, अंदर खोट भरा,
पापी,दोष,निर्गुण लगे,ज्यों कनेर खड़ा,
जहर किनारे तक है,ऊपर अमृत घड़ा,
इंसान के बदलते रूप,बोझिल है धरा।
गिरगिट जैसे रंग बदले,राक्षसरूप धरा,
मौसम भांति बदलता,दिल में पाप भरा,
फन फैलाये नाग सा, धरा पर लेट रहा,
अत्याचारी,निशाचर है,मन में नहीं दया।
कभी बनता गद्दार,कभी नहीं उतरे खरा,
गरीबों को खून चूसता,पाप का है घड़ा,
शराबी,कबाबी,जुआरी अवगुण से भरा,
पल में गुस्सा,पल में दानव, नररूप धरा।
बदल रहे परिवेश में धरा के जीव हजार,
फिर भी दुनिया करती,उन जीवों से प्यार,
मानव अगर बदल जाये,मिलता है द्युत्कार,
इंसान के बदलते रूप,जीवन होता बेकार।
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-होशियार सिंह यादव
कनीना, जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
विषय-मौसम में बदलाव
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विविधता से भरपूर है,भारत देश का मौसम,
सर्दी पड़े कड़ाके की,कभी हो मौसम सम।
बर्र्फ जमे, पानी ठंडा,धुंध,धुआं,धूम कोहरा,
बर्फ पड़ती लगे सुंदर,मौसम लगे गौरा गौरा।
कभी गर्मी पड़े भीषण,पसीने करते टप-टप,
पेड़ पौधे जलने लगे,भूल जाते जन गपशप।
कभी आये पतझड़ तो,रुआसे लगे पौधे पेड़,
पत्ते झड़ झड़ गिरते हैं,जैसे मौसम करता छेड़।
कभी बसंत बहार आये,वन उपवन हो पावन,
कभी मौसम में बदलाव,आता ले वर्षा सावन।
कभी मौसम करवट ले,ओले पड़े अन्न खराब,
कभी मदमाता माहआये,पेड़ लगे पिये शराब।
आये आंधी और तूफान,मिटा दे पल में शान,
पल पल मौसम बदले, मौसम की हैपहचान।
रंगीला देश रंगीला मौसम, छटा बिखेरे बहार,
धरती मां का आंचल भरे, फूल,नदियां,पहाड़।
हाइकु
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1.
निद्रालु बन
कर देश अहित,
कैसी मर्यादा
2
कर्मठ पाता
निद्रालु सो जाएगा
देश महान
3.
देश विकास
कर्मठ जब लोग
निद्रालु रोग
4.
आगे बढ़ाना
निद्रालु एक रोग
कर्मठ लोग
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स्वरचित नितांत मौलिक
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--होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़, हरियाणा-
जरा सुनो
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तोप और तलवारों से नहीं डरता वो देशभक्त बन सकता है वरना कांटों से डरने वालों की देश में कमी नहीं है।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा-
कही अनकही
विधा-दोहा
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कही अनकही जान ले, करो तभी पहचान।
सही वक्त ले फैसला, बनता जन महान।।
कही अनकही पूछ ले, बनो नहीं नादान।
सोच समझ से काम ले, बुजुर्ग कहना मान।।






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