जरा सुनो
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बुद्धिमान जन फूल जैसे होते हैं जो पूजा में काम आते हैं और मूर्ख जन पत्थर जैसे होते हैं जो दीवार बनाने में काम आते हैं।
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--होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
दोहा लेखन
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1.
जब नभ बादल झूमते, नृत्य करे वन मोर।
मन मोहे जन का सदा, बादल गरजे घोर।।
2.
पक्षी भारत का करे, वन में एक पुकार।
अजब छटा है मोर की, कर लो इससे प्यार।।
3.
रहे सदा ही पेड़ पर, नाम पड़ा है मोर।
पीहू पीहू शोर को, सुने सदा चितचोर।।
4.
पंख को कृष्ण मोर के, रखते अपने शीश।
पूरे जग में आज भी, कहलाते जगदीश।
5
जब गर्जन बादल करे, घटा सजे घनघोर।
बागों में झूले पड़े, नाच उठे मनमोर।।
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चुगलखोर
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बचो बचो चुगलखोर से, मरवा दे खड़े दिन,
एक बार चंगुल में फंसे, पल पल घड़ी गिन,
ऐसे ऐसे चुगलखोर हैं, सुन सुन मारों चीख,
छोड़े ना किसी हाल के, मंगवा दे जग भीख।
जगत में पापी घोर वो, करते हैं चुगलीचाटा,
इनकी संगति से बचो, वरना घाटे पर घाटा,
हो सके तो जल्दी से कह दो, टाटा भाई टाटा,
फिर भी नहीं सुधरे तो, मारो लठ और भाटा।।
**होशियार सिंह यादव, लेखक,कनीना,हरियाणा**
कविता
शीर्षक- चुगली
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राजू बोला धर्मा से आओ
मजेदार एक बात सुनाऊं,
कोई सुन ना ले कभी भी
कान में तुमको मैं बताऊं।
धर्मा कान का कच्चा था
झटपट दौड़के पास आया,
बेईमान राजू ने धर्मा को
चुगली का किस्सा सुनाया।
राजू बोला चोरी अच्छी
माल खाओ सदा लूटकर,
मुफ्त माल बंटता हो तो
झटपट भर लो निज घर।
राजू बोला सुन ध्यान से
गांव की भागी एक छोरी,
धन्नों दूध मिलावट करता
बहुत तेज है उसकी गौरी।
पूरे गांव का हाल सुनाया
सुन सुन चुगली धर्मा खुश,
घंटों बातें चलती रही जहां
करते रहे दोनों घुस फुस।
चुगली करके रामू खुश था
धर्मा सुन सुन के मुस्कराया,
बातों ही बातों गुपचुप कर
सारा समय व्यर्थ में गंवाया,
शाम हो गई धर्मा खुश हो
बोला अब मैं घर जाऊंगा,
पत्नी मुझको आज मारेगी
बचा हुआ खाना खाऊंगा।
राजू चुगली करता रहता
धर्मा भी नहीं था कुछ कम,
पाप कमाये जीवन में उन्हें
रोय पीटकर निकला दम।
लोग खुश हुये पापी गये
अब गांव रहे अमन चैन,
चहुं ओर उजाला छायेगा
खुश रहेंगे जन-जन रैन।
चुगलखोर जग में बुरे हो
उनसे बचकर रहना सीख,
चुगलखोर वो दुष्टजन हैं
मंगवा देंगे जगत में भीख।


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