Monday, June 22, 2020


दोहा मुक्तक-
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धरा आज यूं रो रही, खूब बढ़े है पाप।
अधम लोग मिलके करे, भोग बुराई जाप।।
साधु लोग भी डर रहे, जीना है दुष्वार,
अब तो प्रभु पर आश है, वो ही देते श्राप।।
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*होशियार सिंह यादव


दोहा,

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जन की सेवा हो बड़ी, कर लो यह उपकार।
प्रभु का जन में वास है, मिलते पुण्य हजार।।
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*होशियार सिंह यादव



वैराग्य
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गृहस्थ जीवन छोड़ कर, लेता जो वैराग्य।
माफी लायक नर नहीं, जन का है दुर्भाग्य।।
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*होशियार सिंह यादव


क्षमा
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क्षमा दान दिल में रहे, बने जगत पहचान।
माफ किया ऋषि देव को, विष्णु बढ़ी थी शान।।

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*होशियार सिंह यादव


जरा सुनो
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दूध का कर्ज, सैनिक का फर्ज, मरीज की मर्ज इंसान,सैनिक और डाक्टर ही अच्छी प्रकार से जानते हैं। उन्हें अपना अपना कत्र्तव्य अच्छी प्रकार निभाना चाहिए।
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--होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा




कविता
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चली नहीं, किसी की मर्जी,
अपना है देश, अपनी धरती,
गर्मी पड़े या, फिर पड़े सर्दी,
बलिदानों की, लगती अर्जी।

दुश्मन जब भी आंख उठाये,
मार मारकर, उसको  भगाये,
तिरंगे ऊंचा, नभ में  फहराये,
मातृभूमि देखे, मन को हर्षाये।

सब देशों में, निराला है देश,
गद्दार कोई भी, नहीं है शेष,
सभ्यता,संस्कृति, की है गूंज,
विविधताएं हैं, अभी विशेष।

बापू, नेहरू, सुभाष, शास्त्री,
भगत सिंह, सुखदेव राजगुरु,
सोने की चिडिय़ा कहलाता
योग, शिक्षा में देशों का गुरु।

सैनिक योद्धा,वीर जवान है,
भरत मां के कहलाते लाल,
दुश्मन देखकर दम भरता है,
देश धरा करते ऊंचा भाल।।
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*होशियार सिंह यादव


कविता
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तपन सूरज सिर पर ले,
करना पड़े कठोर काम,
बच्चों का है पेट पालना
मेहनत करे सुबह शाम।

भाग्य में जो लिखा हो,
वो तो जग में निभाएंगे,
तब भी भूखे प्यासे रहे,
किसको कैसे बतायेंगे।

गर्मी जब भीषण पड़ती,
गिरते हैं पसीने तड़ तड़,
मन ही मन रोते भाग्य पे,
नयन करते तब पड़ पड़।

जब सर्दी का मौसम हो,
ठिठुर उठे धरा आकाश,
न मिले दो जून की रोटी,
देख देख मन हो उदास।

कठोर काम थोड़ा लाभ,
घर तब पहुंचे हो शाम,
कोई मजदूर नहीं साथी,
आये मुसीबत में काम।।
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