Monday, March 23, 2020

छुपे बैठे 
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घर में छुपे  बैठे सारे
कहीं कोरोना न आए
जब कोई  खांसता है
कोरोना का डर सताए,
खांसी,जुकाम अगर है
लोग डर डर दूर भागे
कोरोना ने गत बना दी
ये जग  रात दिन जागे,
छूत की महामारी फैली
न जाने कब ले ले जान
चाहे कोई कितना बड़ा
नहीं करती  ये पहचान,
कभी लाकडाउन  होता
कभी है निज घर में बंद
कितने अस्पताल में जूझे
मौत हुई है  देश में चंद।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**




 खाना 
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सरकार ने लोकडाउन कर दिया। उसे खाने की चिंता सता रही थी। पैरों से शत प्रतिशत अपंग था और सिर पर दे बेटियों का बोझ भी था।  बुजुर्ग अपनी बच्चियों के सामने बैठा सोच में डूब रहा था कि एक नन्हीं बिटिया की नजर पड़ी तो उसने पिता से पूछा-आज आपकी आंखों में आंसू हैं और खाना भी नहीं खा रहे हैं, आखिरकार क्या कारण है?
पिता ने उत्तर दिया-मुझे कल के खाने की चिंता खाएं जा रही है।
बेटी ने हंसकर एक ग्रास अपने पिता के मुंह में देते हुए कहा-कल की चिंता कल करेंगे। आज जब खाना सामने हैं तो उसे खाना चाहिए। कल मंगलवार है और तुम्हारा व्रत होता है वहीं फिर परसों से नवरात्रे लग जाएंगे। दुर्गा मां सभी का भला करेगी। इतना कहते ही बुजुर्ग के मुख से निकला-वाह, क्या सच बात कही। मैं अज्ञानी बना बैठा था। मैं कल का खाना प्रभु एवं माता पर छोड़ता हूं। इतना कहकर खाना शुरू कर दिया।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**


ताई ताऊ संवाद

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ताई बोली ताऊ से.....
लाकडाउन कर दिया है
ले आओ आटा व दाल
तबियत  खराब हो रही
घर पर  करना देखभाल।
ताऊ बोला ताई से.......
कल जनता का कर्फ्यू था
और आज गये थे खेत में
लाकडाउन अब किया है
सरसों बिखरे अब खेत में,
एक ओर कोराना का डर
दूसरी ओर फसल कटाई
यदि हमें कुछ हो गया तो
होगी जग में खूब हंसाई।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**


  शहीदी दिवस 

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फांसी का फंदा चूमा
दे गए अपनी कुर्बानी
देश तब आजाद हुआ
मिटी थी गोरे मनमानी,
भगत सिंह, राजगुरु थे
कहलाता एक सुखदेव
राक्षस राज  यौवन पर
तब आए ये  तीनों देव,
कांपते थे  गोरे थर-थर
भगत सिंह यूं चलते थे
कितने ही वीर सिपाही
उनको  बहुत खलते थे,
नमन उन देशभक्तों को
करवाया  देश  आजाद
धरती मिटे या आकाश
सदा रहेंगे जग में याद।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**


   छुपे बैठे 

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घर में छुपे  बैठे सारे
कहीं कोरोना न आए
जब कोई  खांसता है
कोरोना का डर सताए,
खांसी,जुकाम अगर है
लोग डर डर दूर भागे
कोरोना ने गत बना दी
ये जग  रात दिन जागे,
छूत की महामारी फैली
न जाने कब ले ले जान
चाहे कोई कितना बड़ा
नहीं करती  ये पहचान,
कभी लाकडाउन  होता
कभी है निज घर में बंद
कितने अस्पताल में जूझे
मौत हुई है  देश में चंद।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**

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