वट सवित्री
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विधा-कविता
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सोमवती अमावस्या आई, लेकर एक पहचान,
शनिदेव जयंती उस पर, कहलाती बड़ी महान।
वट सवित्री व्रत लेकर, सोच रहा सारा जहान,
सदियों तक याद रहेगा, गाये सवित्री यशगान।।
सौभाग्यवती औरत करती, इस दिन व्रत तप,
वटवृक्ष की पूजा करती,दिनभर शिव का जप।
पार्वती और वट की पूजा,मन को देती है चैन,
मन को चैन मिले सुनकर, कतई नहीं है गप।।
अल्पायु में विवाह हुआ, सवित्री लगती थी खुश,
नारद ने कथा सुनाई तो,मन को हुआ था दुख।
निश्चय कर लिया पार्वती,बचाऊं पति की जान,
बेशक जान जाये मेरी तो,जमाना हो जा विमुख।
वटवृक्ष की छांव में, सत्यवान सिर पैरों पे रख,
गहरी नींद में सोया था,जैसे विष लिया है चख।
यमराज फिर चलकर आया, लेकर चला प्राण,
सवित्री ने पीछा किया, हृदय करता धक धक।।
दक्षिणी दिशा में चलता गया,पीछा किया नारी,
पतिव्रता सवित्री को देख,यमराज मंशा भी हारी।
कितने प्रयास किये यमराज, पर सवित्री अडिग,
यमराज घबरा गये, सवित्री की छवि लगे प्यारी।
पूछा इरादा यमराज ने, सवित्री को क्या चाहिये,
सत्यवान की जान गई है, अब घर चले जाइये।
हँसी सवित्री खिलखिला, चाहिए मुझको 3 वर,
फिर तो मैं चली जाऊंगी, सीधी अपने ही घर।।
मांगा पहला वर ,सौ पुत्रों की मां बन जाऊंगी,
दूजे वर में मैं अपने, सास-ससुर नेत्र पाऊंगी।
खोया हुआ है राजपाट, तीसरे वर में दे देना,
देखना फिर मैं तो तुम्हारा पीछा छोड़ जाऊंगी।।
थका हारा सा यमराज, आज हार गया नारी से,
छोड़ी आत्मा सत्यवान की,जैसे मिली उधारी में।
पहुंची सवित्री वटवृक्ष संग,जी उठे थे सत्यवान,
तब से वटवृक्ष और सवित्री कहलाते बड़े महान।
उस दिन से हर नारी, वटवृक्ष पूजा करती आई,
अमावस्या और पूर्णिमा को, पूजा चलती आई।
सवित्री को नमन करते हैं, जग की सारी नारी,
पतिव्रत वो कहलाती रहेगी,सारे जग की प्यारी।।
वटवृक्ष और सवित्री का, नाम रहेगा इस संसार,
सवित्री नाम पर पूजा होगी, मिलता रहेगा प्यार।
सदियों से चली आ रही, सदियों तक रहे जारी,
सवित्री जहां में नाम रहेगा,कहते हैं देवी हमारी।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह
यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
























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