नमक जैसे हो
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विधा-कविता
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बातों में दम नहीं, करते व्यर्थ की बात,
नशा चढ़ा मिलता, बताते दिन की रात।
नमक जैसे लगते हो, मिठास अति दूर,
ठन ठन गोपाल हो, अच्छे नहीं हालात।।
मौन रहते हो सदा,खोलते नहीं हो राज,
सलीखा काम का नहीं,बिगड़ते हैं काज।
नमक सी बातें करते, नहीं कोई है ज्ञान,
मिलते जुलते हो नहीं, तबियत नौसाज।।
व्यवहार अच्छा नहीं, लौटाते नहीं उधार,
दूर दूर रहते तुमसे ही,कोई करे ना प्यार।
नमकीन चेहरा लगता,जैसे समुद्र कोरल,
पागलपन जिंदगी है, लगे जीना है बेकार।।
किस्मत से खोटे लगते, रखते हाथ पे हाथ,
छोड़ देते सभी तुम्हें, देते नहीं तुम्हारा साथ।
नमक जैसे लगते हो, आता नहीं जन स्वाद,
मात पिता रहित हो, लगते हो ज्यों अनाथ।।
नमक से लगते हो, मधुर स्वर में गाता चल,
समस्याएं आती जरूर, निकलेगा जरूर हल।
हर इंसान से रख दोस्ती,तब बन जाये बात,
यूं ही अगर रहा तो, जिंदगी मिलेगी विफल।।
नमक जैसे लगते हो, शक्कर सा बन जाइये,
गुड़ को खाते अति कम,पेड़ा ही बन जाइये।
जैसे नमक पर मीठा पसंद आता है जन को,
कभी स्वयं हँसना सीखों, औरों को हँसाइये।।
नमक जैसे कभी न बन, मीठा चाहते लोग,
नमक जैसे खाकर, लग जाता है एक रोग।
मीठा भी नमकीन बराबर,दे मन को खुशी,
बराबर सुख दुख में रहो,रहना अगर निरोग।।
नमकीन सी बातें हो, फिर हो मीठा स्वाद,
कड़वी सच नहीं लगती, नहीं रहेगी याद।
हर सुख दुख में रहना,हरदम जन को सम,
जिंदगी हँसकर जी ले, करना नहीं फरियाद।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400






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