कविता/गरीबी
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निर्धनता दुख देती आई,
जीना हो जाता है बेकार,
कभी जरूर किसी मोड़,
मिल जाती जन को हार।
नदी नाले जब पार करें,
नहीं मिलती नौका कोई,
बच्चों को पार उतारते हैं,
कहानी बनती तब नई।
बहुत कठिन होता जीवन,
हाथ कहां पे पसार पाएंगे,
ऐसे गरीब जन यूं ही जीते,
बेचारे दुख में मर जाएंगे।।
कहीं नहीं मिलता सुख,
जीवन में दुख ही दुख,
जिससे आशा मदद की,
वो ही मोड़ लेते हैं मुख।।
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स्वरचित/नितांत मौलिक
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* होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
निराशा
दोहा मुक्तक
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लगे निराशा हाथ जब, सोच समझ ले बात।
बीतेगा दिन जब कभी, आती काली रात।।
सुख दुख चलते साथ में, होना नहीं हताश,
बदलेगा फिर वक्त भी, बदलेंगे हालात।।
2
आशा कभी न छोडऩा, कहते कितने संत।
लगे निराशा हाथ तो, आशा से हो अंत।।
कभी न धीरज छोड़ता, वो जन मिले महान,
ठीक समय पर सोचना,मुद्दा दिखे ज्वलंत।।
3
बसे निराशा दुख सदा, छोड़ इसे इंसान।
मिलता प्रसन्न जन कभी, बनती है पहचान।।
सुख दुख चलते संग में, पहिया लगता घूम,
गम में जो जन खुश रहे,बनता वही महान।।
4
बुरी निराशा इस जहां, छोड़ जरा नर आज।
खुशी भरा जीवन सदा, दे जाता जग राज।।
सम रहने की जिंदगी, मिलती बिल्कुल कम,
परहित में जीना लगे, जैसे सिर पर ताज।।
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मौलिक एवं अप्रकाशित
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* होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्
ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
























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