इफ्तार और सहरी
विधा-कविता
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रोजा रखते मुसलिम तो,
करते नियमों का पालन,
इफ्तारी और सहरी पर,
रब करता हैं संचालन।
सुबह सवेरे उठकर वो,
नहाते धोते हैं जमकर,
खाना खाते उसी वक्त,
सहरी मनता उनके घर।
दिनभर कुछ नहीं खाते,
और नहीं कुछ भी पीते,
नियम पालन करें यूं ही,
दिनभर मुख को वो सीते।
शाम ढले जब वो सूरज,
खोलते हैं मुसलिम रोजे,
खाना खाता और पीते हैं,
इफ्तार नाम उसको देते।
जब तक सूर्यदेव रहता,
खाना पीना रखते हैं बंद,
अपने ईश को याद करें,
करें नहीं आवाज बुलंद।
रमजान माह जब आता,
बुरा बोलते नहीं सुनते हैं,
तरावीह वो पढ़ते देखे हैं,
मन ही मन शुभ बनते हैं।
पवित्र माह मानते रमजान,
रोजा रखे वो गुण की खान,
पूरे माह रोजा रखता कोई,
उसे मानते हैं बड़ा महान।
कुरान पढ़ते हैं वो दिन में,
रात को पढ़ते हैं वे नमाज,
कितना बड़ा लाभ होता हैं,
इस बात को वो जाने राज।
चांद दीदार जब नहीं होता,
शुरू करते मुसलिम रोजा,
इबादत वो मांगते रब से,
हो जाती है घर में मौजा।
रोजे से अल्लाह हो खुश,
दुआएं कुबूल करते हैं,
पाप कर्म से दूर रहते हैं,
पाप कर्म नहीं करते हैं।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
चेहरा/मुखड़ा
विधा-दोहा मुक्तक
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मुखड़ा देखा चांद का, आया मन में ख्वाब।
आखिर आता जिंदगी, सुंदर एक सबाब।।
अलग जहां पहचान है, देख अनोखा रूप,
हर मानव को देखकर, मन में उठे जवाब।।
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मौलिक एवं अप्रकाशित
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* होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400








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