आंगन में कुछ यूं
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विधा-कविता
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आंगन में कुछ यूं,देखो फैली है बहार,
सावन माह आया, गिर रही हैं फुहार।
मस्ती छेड़ देता है, रिमझिम का तराना,
मन ही मन में खिल जाता तब प्यार।।
हर घर आंगन में खिल जाते हैं फूल,
आंधी,बारिश और फिर आती है धूल।
कभी घूमते फिरते हैं, फूलों पर भंवरे,
कभी वक्त आता, हो जाते नष्ट समूल।।
आंगन में कुछ यूं, सुबह सुबह लगता,
खिलेगी जमकर आज भी सघन धूप।
पेड़ पौधों का मिल जाता, एक सहारा,
छांव में आता है बड़ा मजा वो अनूप।।
आंगन में कुछ यूं, बज उठती शहनाई,
मन लेने लगता है जमकर ही अंगड़ाई।
कभी आते जाते हैं मन में बहुत ख्वाब,
कभी झेलनी पड़ती है जन को तन्हाई।।
घर आंगन में जब कभी, होता है शोर
चिडिय़ा चहचहाती,नृत्य करता है मोर।
कभी बिजली चमके और घटाघनघोर,
कभी शाम सुहानी हो कभी लगे भोर।।
आंगन में जब गिरने लगती है फुहार,
समझो सावन आया है, लेकर बहार।
कहीं दादुर की शहनाई लगती प्यारी,
कभी पर्वतों से आये आंधी लेके जोर।।
आंगन में कुछ यूं, देखा जाता नजारा,
देखकर एक दूजे के दिल ने पुकारा।
नहीं लगता कि अब कोई शेष कमी,
कितना सुंदर लगता है संसार हमारा।।
आंगन में कुछ यूं, दर्श देते हैं जनाब,
पलते देर नहीं लगती, मन के ख्वाब।
हर कली,फूल व पत्ती खिलती बहार,
तब खिल उठता है उनका भी शबाब।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
KANINA MOHALLA-MODIKA WARD-01 DISTRICT-MAHENDERGARH(HARYANA) PIN-123027 Mob 91+9416348400
Friday, May 20, 2022
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