कैसे इजहार हो
विधा-कविता
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कैसे इजहार हो, प्यार कहते हुये आए शर्म,
दिल की बात होती, बिरला ही जानता मर्म।
प्यार कर तो लेते हैं, परंतु रास नहीं आता है,
प्यार करने पर सांसे फूले, श्वास हो जा गर्म।।
कैसे इजहार हो उनसे, आंखें झुक जाती हैं,
मन प्रसन्नचित हो जाये, सामने वो आती है।
कहना भी चाहता मन की बात, कह न पाऊं,
तन्हाई में उसकी यादें हमको,दर्द दे जाती है।।
कैसे इजहार किया होगा, जो कर गये प्यार,
एक के बाद एक कहीं होंगी, बातें ही हजार।
प्यार सदियों से चला आया,दिल की है बात,
प्यार नकदी का काम है, नहीं मिलेगा उधार।।
कैसे इजहार किया मजनूं ने सामने थी लैला,
खो गया था प्यार में वो, नहीं बना था छैला।
जोड़ी बनी थी जगत में, नाम हो गया अमर,
सच्चा था मजनूं नहीं था मन से कभी मैला।।
प्यार करना तो आसान, वादे निभाना कठिन,
कष्टों में जीकर पूरे किये जाते हैं जग के वादे।
कभी दर्द देने के कभी कत्ल के होते हैं इरादे,
वादे बहुत होते हैं, जहन में बैठी रहती यादें।।
सोहनी महीवाल आये, प्यार के वादे निभाये,
कभी सोहनी को महीवाल, प्यार से बुलाये।
मरकर अमर हो गये हैं वो,वादे जरूर निभाये,
प्यार की जोड़ी हो तो ऐसी जो हरदम हँसाये।।
कभी हीर आई, जो अपने रांझा को रीझाये,
कभी हँसते गाते ही जाये,कभी हँसते आये।
प्यार की दास्तान जग में बड़ी होती निराली,
कोई कैसे किसी को, अपने दिल में बसाये।
कैसे इजहार किया जाये, कोई बता न पाये,
प्यार वो चीज है, जिसमें बस हँसते व गाये।
आओ प्यार करें, प्यार में ही सब खो जाये,
हर प्यार के नगमे को,मन से ही गुनगुनाये।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
ई-मेल-hsnirban2022@gmail.com
नीर/पानी
दोहा -चोका
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बहता देखा
गंगा निर्मल जल
पीते हैं जन
फसल होती पैदा
लोग त्यागते
नदियों में ही मल,
धन धान्य के,
भंडार भर जाते,
सपने सारे
पूरे जन हो जाते,
कभी तड़ाग
कभी बने समुद्र
जल ही करे
समस्या का हल
रखते घड़े
पीते हैं जन जन
पवित्र मन
खाते जब रहते
साफ सुथरा अन्न।।
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नितांत मौलिक एवं स्वरचित
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*होशियार सिंह यादव
वार्ड नंबर 11, मोहल्ला मोदीका
कनीना-123027
जिला महेंद्रगढ़, हरियाणा






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