बहुत बुरे हो
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विधा-कविता
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बहुत बुरे हो, कर्म बुरे हैं, करते चुगलखोरी,
बहुत नाजुक होती है जिंदगी, जैसे हो डोरी।
सत्कर्मों की पूंजी जमा कर,वरना होगी हार,
बुरी बताई इस जहान में,चुगली और ये चोरी।।
बहुत बुरे,व्यवहार बुरा, करते नहीं कभी प्रीत,
अच्छे कर्म करने वाले की हो जीत नहीं हार।
बुरे व्यवहार के कारण जीवन हो जाये बेकार,
छोड़ के से पिंजरा जाने को रहना सदा तैयार।।
बहुत बुरे हो,मारकाट में रखते हो तुम विश्वास,
समझते हो अपने को राजा, तुम होते हो दास।
सोच समझकर काम करो वरना होगा विनाश,
अच्छे कर्म जहां में, आते हैं सभी को ही रास।
बहुत बुरे हो, दिनभर धन के पीछे भागते हो,
दिन में सोते ही रात को भी यूं ही जागते हो।
छोड़कर जाना होता है, जगत से सारी दौलत,
यह बात तुम्हें क्या बतलाऊं,तुम तो जानते हो।
बहुत बुरे हो, जानते नहीं, जग है एक सराय,
पता नहीं किसे बुरा लगे तो किसी को सुहाय।
जाना होता है छोड़कर, सारे अपने बंधुबांधव,
ये दुनिया वाले रोते व्यर्थ में आंसू ही बहाय।।
बहुत बुरे हो, सोच लो, अहित करते दिनरात,
मरते वक्त स्मृति साफ, यादों की आये बारात।
सोच समझकर काम लो,दिल कभी न सताओ,
अंत समय जब आता जन का हो बुरे हालात।।
बहुत बुरे हो, मान लो, करते नहीं कोई काम,
हाथ पर हाथ रखते जग में, हो जाते बदनाम।
सदा हित की बात करे, गिरते को जो थामता,
देखना जगत में वो ही जन पाता है बड़ा नाम।।
बहुत बुरे हो, जग कहता,नहीं तुममें कोई गुण,
मारे जाओगे जग में वैसे, जैसे पिसता है घुण।
काम सदा जगत में करना हो जाए जरूर नाम,
अच्छे गुण अब ग्रहण कर, छोड़ देना निर्गण।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400




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