आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास
विधा-आलेख
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आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास
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इंसान ने बड़ी मुश्किल से धरती पर जन्म लिया किंतु अब जब से इंसानियत गिरती जा रही है तब से वह राक्षसी रूप में बदलता जा रहा है। प्रभु ने इंसान को जन्म इसलिए दिया था कि धरती पर अत्याचार और दूसरे के दुख हो को कम कर सके किंतु हालात यह बन गए हैं कि इंसान दूसरे इंसान की बुराइर्, गाली गलौज तथा अहित करने पर तुला हुआ ह।ै धर्म-कर्म के मार्ग पर से भटक गया है। इंसानियत आज जंगल की ओर जा रही है बेशक मानव मंगल की ओर जा रहा है। इसलिए तो यह सत्य कहावत लगती है कि -आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास।
इंसान का प्रतिदिन का अधिकांश समय केवल पाप और दूसरे की बुराई में बीतता है। यदि हकीकत को देखें तो इंसान का बहुत अधिक समय अनाप-शनाप अनर्गल आदि बातों में बीतता है । वह नहीं सुनता कि भगवान ने उन्हें इसलिए धरती पर अवतरित किया है ताकि वह कुछ ऐसा काम करके जाए ताकि सदियों तक याद किया जाए किंतु उसके जीवन में केवल बुराइयों का ढेर लगा है। सुबह से शाम धन के पीछे दौडऩा, खाने तक को भूल जाना, केवल दिल में दूसरे से अधिक धन कमाना रह गया ह।ै कभी हंसने का मौका मिलता ही नहीं किसी दूसरे की सोच का मौका मिलता नहीं।जब से मोबाइल आया है तब से तो दूसरे इंसान के सुख-दुख को भी भूल गया है। मोबाइल में ही सब कुछ देखता रहता है अगर मोबाइल में कुछ मिल जाता है तो वह उसे सत्य समझ लेता है और हकीकत इस संसार में जो हो रहा है उसे वह मानता ही नहीं। उसका एक ही अर्थ होता है कि कैसे भी अधिक से अधिक धन कमाए, दूसरे को बेशक ग्रत में धकेला जाए। इंसान गिर रहे हैं,गरीबी से मार खा रहे हैं, दुख झेल रहे किंतु उनकी कोई चिंता नहीं है। उसका तो अपना एक लक्ष्य धन कमाना है। यही कारण है कि इंसानियत खत्म हो चली है। यही कारण है कि उस पर यह कहावत सही लागू होती है आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास।
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स्वरचित/नितांत मौलिक
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* होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
प्रतीक्षा
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विधा-कविता
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बीत गये 14 वर्ष भरत के, आएंगे कब राम,
खड़ाऊं पूजा कर थके,भरत सुबह और शाम।
उर्मिला की खत्म प्रतीक्षा, आए लक्ष्मण द्वार,
राम का अभिषेक हुआ,जन जन मिला प्यार।।
प्रतीक्षा में बीत गया, सबरी देख रही है बाट,
प्रतिदिन वो फूल बिछा, भूली खाना व खाट।
प्रतीक्षा खत्म हुई जब, आये खाये सबरी बेर,
खाये हँसकर बेर सबरी, ज्ञान दे डाला विराट।।
कितने गये महाभारत युद्ध में,एक के बाद एक,
माता बहने इंतजार कर रही, भाई बहनें अनेक।
18 दिन में युद्ध खत्म, इंतजार की घडिय़ां अंत,
पांचों पांडव लौट आये, संग में कितने ही संत।।
प्रतीक्षा की घडिय़ा कठिन, दर्द में जीते हैं लोग,
प्रेम की आग तन में लगे, बढ़ जाता मिलन रोग।
प्रेमी युगल तो करें इंतजार, आएगी मिलन घड़ी,
प्रतीक्षा की घड़ी खत्म, मिलन का होता संयोग।।
परीक्षा देते सहस्त्र विद्यार्थी,रिजल्ट का इंतजार,
आता परिणाम जब कभी,जीते कोई जाये हार।
कहीं मनती खुशियां तो, कहीं डूबते लोग गम,
किसी पर बरसते डंडे तो किसी को मिले प्यार।।
हो चुके अब चुनाव, प्रतीक्षा हो अब परिणाम,
किसी को कुर्सी मिलेगी, किसी का होगा नाम।
हर बुरी होती नेता को,जीना होता है तब बेकार,
चाहे जो भी परिणाम आये, वोटर किया काम।।
हर इंसान को सहनी पड़े, प्रतीक्षा होता है नाम,
प्रतीक्षा में सूख जाते बूढ़े, निकल जाते हैं प्राण।
प्रतीक्षा की बातें सुनकर, मन हो जाता है बेचैन,
प्रतीक्षा होती हर इंसान, निकल जाते तब प्राण।।
प्रतीक्षा हीर रांझा की, प्रतीक्षा सोहनी महिवाल,
प्राण गंवा दिये शीरी ने मिला नहीं वो फरियाद।
लैला मजनूं के किस्से दे जाते मन को सदा दर्द,
बस प्रतीक्षा में बीते जन की,आती प्रभु की याद।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड
नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400





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