Friday, May 13, 2022

                      शायद

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विधा-कविता   
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गुजर गया जो वक्त है, आये नहीं दोबारा,
साथी सगे संबंधी, भूल जा यह चौबारा।
शायद मरकर कोई जन, आ नहीं पाएगा,
समय बड़ा बलवान, समक्ष हर जन हारा।।

शाम ढल जाती है, दे जाती सुबह दस्तक,
कभी खुशियों से पागल,ऊंचा हो मस्तक।
शायद बीता वक्त तो, लौट कभी न आये,
गाना बजाना कर पूरा,चाहे हो तार सप्तक।।

आते जाते कितने ही जन,उनका पता नहीं,
चले जाते हैं धरती से किसी को पता नहीं।
शायद कोई बता पाए, मरने पर क्या होता,
खोज खोजकर पच मरे,वो जाते जरूर कहीं।।

शायद शब्द संशय देता, प्रयोग नहीं करना,
सच्चे मन से काम करो,कभी नहीं है डरना।
धर्म कर्म के मार्ग पर सदा यूं ही विचरना,
परहित मार्ग चलकर, लोग पाप को हरना।।

लाभ हानि संग चलते, आते दोनो जरूर,
धन दौलत का गर्व नहीं,छोड़ो यह गरूर।
शायद ऐसा कोई जन, हानि नहीं मिलती,
लाभ मिले जब जन को, आ जाता है नूर।।

सुख दुख दोनों भाई, आते दोनों घर घर,
निडर होते हैं दोनों भाई, नहीं इनको डर।
शायद ऐसा धर होगा, जहां ये नहीं आये,
चाहे दुख जन बदले, मांगे भीख दर-दर।।

वक्त बदलते देर नहीं, गरीब बने अमीर,
कायर जन वक्त पर, बन जाता बड़ा वीर।
शायद ही कोई जीव,वक्त पड़े हो कायर,
मय बदल जाता है, रखना पड़ता है धीर।।

चलते चलते बुरा हो, अच्छाई करो आज,
कल भिखारी बन जाए,आज जिनका राज।
शायद ही सदा अच्छा वक्त साथ दे उम्रभर,
सत्कर्मों के बल पर ही, मिलता जन नाज।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
  फोन 09416348400

 

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