किनारा नहीं मिलता
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विधा-कविता
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डूबते जन को कभी,किनारा नहीं मिलता,
रात के अंधेरा में कभी,सूरज नहीं खिलता।
वक्त से डरकर रहना सीख लो ऐ मानव,
ठोकर मारने से कभी, पर्वत नहीं हिलता।।
डूबती सांसों को, कभी सहारा न मिलता,
युद्ध मैदान में तो,कोई प्यारा नहीं मिलता।
पर हिम्मत नहीं हारना अभी से सीख लो,
कांटों के दर्द पर, इक सुंदर फूल खिलता।।
बेरहम दुनिया कहलाती है, नजर दौड़ाना,
कभी परायों के बीच,बेगाना नहीं मिलता।
तोड़ देती है एक झटके के साथ दिल को,
कभी पवन के झोकों से,पत्ता नहीं हिलता।।
बहुत बेदर्द जमाना है, फिर नहीं आना है,
कुछ करना हो कर लो,जग से ही जाना है।
बुरे को अच्छा बताती है यह सारी दुनिया,
बेरुखी को तो हर जन के पास पैमाना है।।
साथ देता है जमाना, जब भाग्य चढ़ता है,
ढूंढे भी नहीं मिलता,जब भाग्य गिरता है।
स्वार्थ से भरी मिलती है यह सारी दुनिया,
बस धन का मारा मारा इंसान यूं फिरता है।।
पाप अहित की सोच रखते हैं लाखो लोग,
बुराई दर्द देना इंसान का बन चुका है रोग।
किसी से प्रीत रखना गुनाह माना जाता है,
चुगली चोरी अहित का खोल बैठे उद्योग।।
स्वर्ग का इस जग में, किनारा नहीं मिलता,
खुशियों से भरा वृक्षों पर फल नहीं लगता।
धर्मनिष्ठ बातों को मानते हैं बहुत कम लोग,
निज पाप कर्मों का कोई हिसाब नहीं रखता।।
डूबते भाग्य का कभी, किनारा नहीं मिलता,
अच्छे किये कर्मों का सदा फल नहीं मिलता।
ठोकर मारकर चलने की आदत बदल डालो,
गिर जाते इंसानियत से तो,सहारा नहीं मिलता।।
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स्वरचित/मौलिक
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* डा. होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन 09416348400
























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