Saturday, November 07, 2020

मृत्यु
विधा-दोहा
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जीवन जन को यूं मिला, करे भलाई काम।
मृत्यु कभी इंसान की, अटल सत्य है नाम।।

जीवन जन को यूं मिला, करे भलाई काम।
मृत्यु कभी इंसान की, अटल सत्य है नाम।।

जीवन चलना नाम है, रुकना मौत निशान।
लगातार जन काम से, बनती जग पहचान।।

कैसा जीवन जन मिला, करता उल्टे काम।
मृत्यु जब कभी पास हो, होगा वो बदनाम।।

जीवन मानव को मिला, करे भलाई काम।
मृत्यु एक दिन जब मिले,अंतिम होगी शाम।।

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दोहा ************************
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कर्कशता हो जब कभी, बुरा कहेंगे लोग।
मधुर भाव जन के मिले,कहलाता संजोग।।

कहते पानी क्षीर है, तन मन रखता ख्याल।
गर्मी सर्दी जब रहे, जल पीना हर हाल।।
 
गुरु को साबुन मानिये, अंधकार करे दूर।
उसके कदमों में हटे, मन का मैल गरूर।।



कुछ कहना चाहूं भी तो
कविता
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कुछ कहना चाहूं भी तो,नहीं कह पाता मैं आज,
कुछ बातें दिल में होती,छीपे रहते उम्र भर राज।
कुछ राज ऐसे भी होते, प्रकट होते वो देर सवेर,
समय सभी का आता है,लग सकती है कुछ देर।
खूब सता ले दुनिया को,हो जाएगा एक दिन ढेर,
सुंदर सरस जीवन मिला,मौका मिलेगा नहीं फेर
पुण्य कर्म कर दुनिया में, छोड़ पाप फरेब धोखा,
सत्कर्मों से नेह लगा ले,फिर नहीं मिलेगा मौका।
धन दौलत के चक्कर में, क्यों मन में तू इतराता
चला जाये जब जग से,फिर लौट कोई ना आता।
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कुछ कहना चाहूं भी तो
कविता
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कुछ कहना चाहूं भी तो,
कह नहीं पाता मैं आज,
कुछ बातें दिल में होती,
छीपे रहते उम्र भर राज,
कुछ राज ऐसे भी होते,
प्रकट होते वो देर सवेर,
समय सभी का आता है,
लग सकती है कुछ देर,
खूब सता ले दुनिया को,
हो जाना है एक दिन ढेर।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक



जीवन की ढलती शाम

विधा-कविता
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जीवन की ढलती शाम हो,
बस ईश्वर से ही काम हो,
अंतिम सत्य की ओर बढ़े,
मन बनता सुंदर धाम हो।

जीवन की ढलती शाम हो,
बस जग में अपना नाम हो,
सोच बड़ी बनाते रहना है,
तब ही जगत जन नाम हो।

जीवन की ढलती शाम हो,
ये पुण्य कर्म जन काम हो,
अमर नाम कर जाएंगे तब,
बस लोगों का पैगाम हो।

जीवन दिया है उस दाता,
फिर क्यों इसे करे बर्बाद,
बुरे कर्म जो करता रहता,
कोई नहीं करता उसे याद।

आओ दाता को याद करें,
वो कहलाते हैं पालनहार,
जीवन की ढलती शाम में,
वो देते हैं मानव को प्यार।।


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