Sunday, November 15, 2020

 


दोहा ****************************
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विचलित होता मन कभी, जाना प्रभु के द्वार।
भेदभाव चलता नहीं, मिले बराबर प्यार।।

दुश्मन छोटा हो नहीं, मानो कभी न हार।
लाख दिखावा वो करे, करो नहीं तुम प्यार।।

बुरा कभी मत सोचना, खुद का होगा नाश।
धोखा जन से जो करे, होगा सदा विनाश।।

विचलित
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विचलित होता मन कभी, जाना प्रभु के द्वार।
भेदभाव चलता नहीं, मिले बराबर प्यार।।
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विधा-कविता
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माटी के दीये लेकर,
आशा मन में हजार,
बिक जाएंगे सारे ही,
संस्कृति से हो प्यार।

एक एक दीये में भरा,
मेहनत का  वो संसार,
खून पसीना एक किया,
दीयों से आशा अपार।

सुबह से शाम हो आई,
दीया बिका नहीं एक,
हाथ जोड़  विनति की,
गुजरे जन देख अनेक।

शाम हुई गरीब रो रहा,
श्रीराम तेरी प्रजा कैसी,
लौटे थे जब बनवास से,
रही न अब जनता वैसी।

हाय गरीब जन मेहनत,
मिल गई सारी माटी में,
अगर लोग नहीं सुधरेंगे,
मिल जाएंगे सब माटी में।

तरस खाओ गरीबों पर,
मेहनत जाये नहीं बेकार,
खरीदों इनके दीये सदा,
मेहनत नहीं जाये बेकार।।
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गोवर्धन पूजा
विधा-कविता
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महिमा कृष्ण की गाते हैं,
जगत का वो होते आधार,
जब जब विपत्ति आ पड़े,
तब तब वो लेते अवतार।

गोवर्धन अंगुली पर उठा
युग प्रवर्तक ने की सुरक्षा
इंद्र देव ने मानी हार तब
गोकुल को मिली शिक्षा।

गायों की सेवा करने का
श्रीकृष्ण ने दिया था ज्ञान
गौमाता की पूजा कर लो
बढ़ जाए धन और शान।

गायों को पालते थे कृष्ण,
गोपालक जगत कहलाए,
कितने गोकुल के लोगों के
दुख दर्द झट में मिटाये।।


अंदाज अपना अपना
विधा-कविता
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बाग/कविता
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गुलशन में बहार आती है,
मन भंवरे का तड़पाती है,
प्रेमी युगल  बैठे बाग में,
प्यार की आग सताती है।

उजड़  जाता बाग बगीचा,
नहीं सुनाई देता कोई शोर,
खिजा छा जाती है गुलशन,
दर्द में उठती आती है भोर।

बाग सदा सुहाते मन को,
भर देते सदा मन में प्यार,
जीत सदा ही होती आई,
नहीं मिलेगी कभी हार।।







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