मुसाफिरों से मुहब्बत
विधा-कविता
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मुसाफिर बनकर जगत से,
हर जन को चले जाना है,
चार दिन का साथ मिला,
आखिर प्रभु को पाना है।
मुसाफिरों से करो मुहब्बत,
चार दिनों का जग मेला है,
जाना होता इस जग से जब,
पास नहीं धन और धेला है।
मुसाफिरों से प्रीत भली हो,
एक दिन उस राह चलना है,
बेशक मन में इतरा ले प्यारे,
यह संसार छोड़ निकलना है।
प्रीत,प्यार,प्रेम,मुहब्बत सभी,
इस जग में बची रह जाएंगी,
तेरे पाप,नीच कर्म,अत्याचार,
पीछेसे ही मजाक उड़ाएंगी।
सोच समझ कर पग धर ले,
मुसाफिर से मुहब्बत कर ले,
ओछे कर्म अभी त्याग दे तू,
अपने तन को शुद्ध कर ले।
मुसाफिर है हर शख्स ही,
जाना होता भव सागर पार,
मुसाफिरों से मुहब्बत करे,
मिलता उसको जहां प्यार।
जगत मुसाफिरखाना होता,
कोई यहां हँसे कोई रोता,
कोई दामन में खुशियां ले,
कोई अपने नयन भिगोता।
कोई जन दुख दर्द सहता,
कोई मुसाफिर साथ रोता,
कोई उनकी सेवा करता,
कोई मुहब्बत झेल सोता।
मुसाफिरों से हो मुहब्बत,
नाम कमाएगा वही जरूर,
चलो चले लंबे सफर पर,
छोड़ दे इस जग का गरुर।
मुहब्बत होती जिस इंसान,
वो होता है जगत में महान,
मुसाफिरों से मुहब्बत करो,
बन जाएगी जगत पहचान।
मुसाफिर तुम मुसाफिर हम,
फिर जन को काहे का गम,
बिछुड़ जाता है मुसाफिर तो,
होता है राहगीर को ही गम।
मेला, मुसाफिर,भीड़ सारी,
एक दिन यहीं रह जाएंगी,
मुसाफिर तो गुजर जाएंगे,
याद उनकी सदा सताएगी।
मुहब्बत मुसाफिरों से करे,
ऐसे लोग कम ही मिलते हैं,
उनकी मुहब्बत के बल पर,
फूल, कली सब खिलते हैं।
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*छठ पूजा
विधा-कविता
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चार दिनों का पर्व होता,
छठ पूजा कहलाता है,
दीवाली बीते छह दिन,
छठ पूजा पर्व आता है।
पहले दिन नहाय खाय,
खरना होता है दूजे दिन,
तीसरे दिन सांध्य अघ्र्य,
अघ्र्य देते हैं अंतिम दिन।
घोर तप करती महिलाए,
दान पुण्य में होती आगे,
शुद्ध सात्विक विचार हो,
दिन रात को व्रती हैं जागे।
पूड़ी,सब्जी का कर त्याग,
चूल्हे में जलाके के आम,
प्रथम खाना खाएगा व्रती,
करता दिनभर शुभ काम।
सूर्य की बहन होती षष्ठी
जिसका पर्व छठ पूजा
बिहार का लोक पर्व हो
इससे बड़ा ना पर्व दूजा।
माता अदिति ने की थी,
पुत्र प्राप्ति को यह पूजा,
सूर्य,कर्ण, द्रोपदी ने की,
छठ मैया की बड़ी पूजा।
परिवार प्रसन्न रहे सदा,
इसलिए पूजा करते जन,
कई बीमारियों से बचता,
स्वस्थ रहता है तन मन।
छठ मैया कल्याण करेगी,
करते हैं यह मंगलकामना,
सदा-सदा प्रसन्न रहे जन,
दुखों का नहीं हो सामना।
दोहा*********************
दोहा नंबर -03
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जैसे कुत्ता काटता, वैसे काटे लोग।
भला करो इंसान का,कष्ट जहां के भोग।।
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दोहा ****************************
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सारी दुनिया में मचा, अजब गजब का शोर।
हर जुबान से सुन रहे, बढ़े जगत में चोर।।
पाप बढ़े संसार में, पापी पाते नाम।
मार रहे इंसान को, नरक मिलेगा धाम।।
जैसे कुत्ता काटता, वैसे काटे लोग।
भला करो इंसान का, कष्ट जहां के भोग।।






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