माटी का घर/कविता
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माटी के घर से, होता जन को प्यार,
इच्छा हो घर लौटूं,चाहे मील हजार,
पक्के दिल के लोग, मिलते कच्चे घर,
अपने वचन के सच्चे,नहीं मिले डर।
माटी के घर तो, करे एसी का काम,
सर्दी में गर्म रहता, गर्मी में दे आराम,
धन दौलत कम हो, भजते रहना राम,
कच्चा घर मंदिर, लगता है एक धाम।
माटी के घर तो, जन को देते हैं चैन,
आराम मिले इतना, नींद खुले न रैन,
बुजुर्गों ने बीताया,जीवन अपना सोच,
भंडार भरे अन्न के,सदा रही थी मौज।
माटी के घर में, पूजा अर्चना मिलती,
रहते वहां देव, देख कलियां खिलती,
जहां नहीं चिंता किसी,ऐश व आराम,
बस खुशी से बीतेगी,ले प्रभु का नाम।
आओ बनाए,माटी का एक सुंदर घर,
जहां सुबह और शाम, बने रहे निडर,
हर हर करते कटे जिंदगी,रहेंगे अमर,
सबसे प्यारा,सबसे सुुंदर,मेरा माटी घर।।
पहला प्यार
कविता
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इंसान एक है रूप हजार,
कभी रोये कभी करे प्यार,
प्रेमिका संग मिलता तैयार,
परंतु याद रहे पहला प्यार।
पत्नी पत्नी गये थे बाग में,
मन ललचाया देख फूल,
पत्नी को बाजू से उठाया,
फूल तोडऩे की की भूल।
देखा पति पत्नी का प्यार,
रह गये जन हक्का बक्का,
पत्नी भी बड़ी खुश हुई,
पति ने मारा फिर छक्का।
प्यार दिलों में पलता है,
प्यार बड़ा ही खलता है,
कैसे करे मन पर काबू,
पहला प्यार मचलता है।।
जीवनभर नहीं भूलता,
पहला प्यार हो निराला,
जीवन में खूब प्यार हो,
देते रहना बस हवाला।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
विधा-कविता
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पतिदेव गये विदेश में ,
आएंगे अब वर्षों बाद,
नीर भरे गौरी उदास,
आती पिया की याद।
कैसे बीतेंगे, दिन मेरे,
कैसे बीतेंगी सर्द रात,
सूना घर है आज मेरा,
ये दिल में यादें साथ।
पानी में लहरें उठती,
कर रही मन झकोर,
बैरी मोर पीहूं पुकार,
मन को करती विभोर,
आयेंगे जब पतिदेव,
आलिंगन करूं जोर,
वो है मेरा पतंग ऐसा,
कसकर पकडू़ं डोर।।
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जरा सुनो
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आज का विषय-
आडंबरों के विरुद्ध बोलने का अधिकार सब को
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आडंबर समाज के लिए घातक साबित हो सकते हैं। सभी उन्हें हटाने का प्रयास करेंगे तो ही संभव है आडंबर मिट पाये।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
गंगा/सुरसरि/भागीरथी/देवनदी/दोहे
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नदी पावनी देव सम, गंगा नाम जहान।
मानव मोक्ष प्रदायिनी, जन जन में पहचान।।
देवनदी को मानते, मानव का वरदान।
पूरे जग में आज है, गंगा की पहचान।।
सुरसरि को मानते हैं, मोक्ष जगत आज।
हर दिल में करती रहे, युगों युगों तक राज।।
गंगा की लहरें कहे, लो आओ अब पास।
पाप सभी पल दूर हो, फल मिलता उपवास।।
गंगा यमुना संग में, सरस्वती का वास।
त्रिवेणी जहां मिल रही, मन को आए रास।।






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