सुनो
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आज का विषय-
धार्मिक आस्थाओं से खिलवाड़
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धार्मिक आस्थाओं से खिलवाड़ देश को गर्त में ले जाने का मार्ग है।
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दोहा ****************************
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उलझन में जब मन पड़ा, रुक जाते सब काम।
शांतचित मनन कीजिये, प्रभु का यह पैगाम।।
सर्दी बढ़ती जा रही, पहन गर्म पोशाक।
ठंड लगे जब तन कभी, बहता रहेगा नाक।।
मेवा मिश्री डाल के, लड्डू खाओ आज।
दर्द मिटे तन के सभी, सेहत का है राज।।
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शहनाइयां/कविता
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खूब सताया कोरोना ने,
अब बज उठी शहनाई,
आना मेरी शादी में तुम,
चहुं ओर आवाज आई।
डीजे पर थिरक रहे पैर,
भूले मास्क लोग लुगाई,
गाते- मेरे यार की शादी,
करे जमकर सभी हंसाई।
थोड़े वस्त्र पहन लिये हैं,
ठंड में चले ठुमक ठुमक,
देव उठनी एकादशी आई,
घरों में होती चमक धमक।
इस वर्ष अल्प मुहूर्त होंगे,
जल्दी करो, ब्याह सगाई,
हंसी खुशी में बीतेंगे दिन,
सांवली सूरत दिल बसाई।
भूल चूके अब महामारी,
विवाह शादी लगे प्यारी,
बंध जाओ बंधन प्यारो,
शुभकामनाएं तुम्हें हमारी।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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कविता
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एक मीरा हुई जगत,
पूरा जग सुने कहानी,
प्रभु प्रभु रटती रहती,
श्रीकृष्ण हुई दीवानी।
खाना पीना भूल गई,
तन मन में रमे गोपाल,
सोते जागते रटती रहे,
प्रिय बड़े थे नंदलाल।
जहर का प्याला पी,
हो गई थी मीरा अमर,
प्रियतम श्रीकृष्ण माना,
चुना था कठिन डगर।
चैन नहीं मिलता था,
सीने लगाती गोपाल,
ताउम्र दीवानी बनकर,
बदली जग की चाल।
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चांद
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एहसास होता है चांद का,
देखता हूं सामने मेरा यार।
सोलह शृंगार में चांदनी सी,
लुटा रही सर्वस्व ही प्यार।।
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
शारद ऋतु
विधा-कविता
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टप टप ओस पड़ रही,
आसमान लगता सफेद,
चादर सी सरसों ओंढे,
शारद ऋतु खोलती भेद।
किट किट दांत कर रहे,
हाथ पैर में लगती ठंड,
जमकर चाय चुसकी ले,
छुप छुपकर दंड ले पेल।
आग सेकते नर व नारी,
भीगी अंगिया भीगे साड़ी,
शांत शांत, प्रकृति लगती,
भूत नजर आती हैं झाड़ी।
सरसों पीली पीली फूले,
फसल ले रही अंगड़ाई,
होली की आहट सुनती,
मेंढ़े भूल गये सब लड़ाई।
छुपकर बैठे हैं पक्षी भी,
कहीं नहीं सुने चहचाहट,
कभी नभ पर शीत लहर,
कभी बारिश की आहट।
बर्फ जमी है पहाड़ों पर,
समुद्र पानी बर्फ समान,
मूली, गाजर, शक्करकंदी,
सेब संतरा बनी पहचान।
बच्चे बूढ़े जीना मुहाल,
जा रहे काल की गाल,
मवेशी दूध हो रहा कम,
आंखें होती जाती हैं नम।
चहुं ओर शोर मचा है,
लाओ ऊनी वस्त्र रजाई,
आग सेक लो हाथ चले,
खाओ गोंद लड्डू मलाई।
सेहत में मोटे लगते हैं,
तन पर भरे वस्त्र हजार,
सेहत खातिर शारद ऋतु,
कर लो सेहत से ही प्यार।




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