Thursday, November 19, 2020

मुझे लौटा दो
विधा-कविता  
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मुझे लौटा दो, मेरा बचपन,
हर्षित होता था, तन व मन,
दर्द देता जैसे माह अगहन,
पराये लगते आज,हर जन।

रोता है वो आज अपनापन,
सूख चला है आज मेरा तन,
ना जाने क्यों गया, मन हार,
जाने कहां खो गया वो प्यार।

मुझे लौटा दे,मेरी माता प्यार,
देती थी मुझको,दुलार अपार,
अभी चूकता करनी है उधार,
दर्शन को खड़ा, मां को तैयार।

मुझे लौटा दे, पिता की प्रीत,
पास आता था सुनाते थे गीत,
अजब गजब, पिता पुत्र रीत,
हार ना होती थी हरदम जीत।

आती थी, चाय लेकर, भार्या,
कहती थी सुनों मेरे ही आर्या,
कभी तेल लगाकर सुलाती थी,
कभी हंसती तो कभी गाती थी।

मुझे लौटा दे, भाई का सहारा,
देवों सा लगता था सदा प्यारा,
छोड़कर चले गये न जाने क्यों,
नहीं बचा जग में कोई हमारा।

मुझे लौटा दे,दादा दादी कहानी,
बिस्तर पर मिलता दूध व पानी,
कभी सुनाते, परियों की कहानी,
कभी आई थी, अल्हड़ जवानी।

मुझे लौटा दे, वो रिश्ते व नाते,
खो चुके सभी तो बड़ा पछताते,
याद करके, ख्वाबों में खो जाते,
अपना मिले उसे गले से लगाते।

मुझे लौटा दे,यार,दोस्त व सखा,
पास रहकर उनका स्वाद चखा,
वो भी गये छोड़, अब बेसहारा,
किसको पुकारे कोई ना हमारा।

मुझे लौटा दे वो जवानी का नशा,
अब तो मुझे इस, बुढ़ापे ने डसा,
हर इंसान देख देख मुझको हँसा,
समय ने कर दी मेरी कैसी दशा।

सब कुछ लुट चुका,राख बनेगी,
कुछ भी नहीं लौटेगा,यादें बचेंगी,
ये जन्म अब पूरा होने को आया,
अब तो दुख दर्द, मन को सताया।

मुझे लौटा दो, वो गुजरा जमाना,
सभ्यता, संस्कृति दुनिया ने माना,
वो वीर,धीर,महान,देशभक्त प्यारे,
आओ चलकर बस पास हमारे।

मुझे लौटा दो, बचपन की खुशी,
दौड़ते गलियों में नहीं कभी दुखी,
नहीं आएगा, लौटकर वो नजारा,
अन्तस मन में लगता मुझे प्यारा।






दोहा *********************
घटना
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घटना चलती रोज ही, उल्टे सीधे काम।
दुर्घटना हो जब कभी, होगा काम तमाम।।
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 धूप
विधा- दोहा छंद





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धूप छांव दो रंग हैं, अपना अपना रूप।
झेल सभी अब जा रहे, दरिद्र हो या भूप।।

कभी धूप में लग रहा, छांव सुहानी भान।
दोनों को ही सम समझ, होगा जग का ज्ञान।।

धूप मिटे छांव है, छांव मिटे तो धूप।
कभी उजाला हो रहा, ढलता फिरता रूप।।

जिस घर में हो धूप तो, होगा वहां प्रकाश।
रोगाणु बचेगा नहीं, रोगों का हो नाश।।

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