Friday, January 01, 2021

 छंद
दोहा छंद
********************

*************************

*********************************
छंद बनाना सीखकर, बन जाएगा कवि।
मनमोहक गर काव्य हो, अच्छी बनती छवि।

नहीं आसान जगत में, छंद बनाना काम।
कविता का ही रूप है, कर दे जन का नाम।।

मन को देखो छू रही, आज बनाई छंद।
सुन सुनकर वो खुश हुये, हँसते हैं जन मंद।
********************
स्वरचित, नितांत मौलिक
************************


 दोहा****************
**************************


सर्दी बढ़ती जा रही, पाला जमता पात।
मुश्किल बाहर निकलना, ठंडी होती रात।।

नया सवेरा कह रहा, हँसते रहना रोज।
खुशियों से दामन भरे,जीवन होता खोज।।

नया सवेरा कह रहा, लाया नव सौगात।
नाम कमाना जगत में, मेहनत कर दिनरात।।
*********************





विधा-कविता
********************

तमन्ना है चांद छूने की,
वो पूरा कर दिखलाएंगे,
चांद पर जल्द पहुंचेंगे,
जा बस्ती वहीं बनाएंगे।

बहुत साल इसे तड़पाया,
छूना चाहा पास न आया,
ऐसी एक योजना बनाकर,
चांद जाकर मिट्टी लाया।

सारे भेद अब खोल डाले,
धब्बे चांद पर काले काले,
चंद्रयान जा रहे बारी बारी,
सारे के सारे भेद वो खोले।

बस्ती एक दिन बनाकर के,
मिलकर हम हल चलाएंगे,
खूब अन्न फल फूल उगाके,
धरती पर ही बेचने आएंगे।

मत इतराना चांद मामा तू,
तूने छुपा रखे बड़े ही भेद,
देरी पहुंचने में बहुत हुई,
हमको बस इसका खेद।।








छंद
विधा-कविता
********************
छंद बनाकर गाइये,
बन जाओगे कवि,
सुंदर सुंदर छंद हो,
बनती जग में छवि।

छंद खुशी भर देती,
छंद करती परेशान,
छंद मन को मोहती,
छंद से हो पहचान।

छंद के रूप अनेक,
गाओ जमकर छंद,
ऐसी दंद लो छेड़ो,
मन में उठती द्वंद्व।

छंद जग आधार है,
करती औषध काम,
रोग दोष सब दूर हो,
बीते सुबह व शाम।।

No comments: