गरीब ढोये जिंदगी का बोझ
कविता
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गरीब ढोये जिंदगी का बोझ,
एक दिन नहीं, वो रोज रोज,
रोटी की करता नित तलाश,
रोटी बने बस उसकी खोज।
सुबह उठता दर्द का सांया,
शाम ढले वो घर पर आया,
बच्चे उसके हैं आश लगाये,
कहते वो पापा रोटी लाया।
फैक्ट्री, उद्योग हो कारखाना,
ईंट भट्ठा हो, या मयखाना,
रोटी खातिर सेवा करते वो,
लगता चेहरा जाना पहचाना।
गर्मी सर्दी हो या बसंत कहार,
मजदूर मिलते हैं घर से बाहर,
खूब कमाते मिलते हैं दिनभर,
मिलती फिर भी उनको हार।
फटे पुराने वस्त्र मिले तन पर,
खाने को नहीं मिलती है रोटी,
पढ़ाई लिखाई कैसे वो करते,
उनकी है बस किस्मत खोटी।।
जयगान
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जिनका जयगान गूंजता था,
प्रतिद्वंद्वी कैसे आज हुये।
जिनका नाम दिलों में था,
वो कैसे आज बेताज हुये।।
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अमीर
विधा-सायली छंद
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अमीर
देते रहते
गरीब को पीर
चलाते हैं
तीर
गरीब
दुखी आज
अमीरों का राज
कैसे करे
नाज
दर्द
जहां में
देते हैं अमीर
बढ़ाते वो
पीर
शहीद
विधा- मुक्तक
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गोली खाते वीर जब, होता जग में नाम।
मातृभूमि को सींचते , देते हैं पैगाम।।
सदा रहेंगे याद वो, अपने देश शहीद,
वीर शहादत से बना, सुंदर भारत धाम।।
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मुक्तक
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वीर धीर बलबीर हैं, हनुमत उनका नाम।
भक्तजनों के कष्ट में, मिले सुबह हर शाम।।
सुख दुख तो इंसान में, जीवन के हैं रूप,
करते विपत्ति दूर प्रभु, जन हर्षाना काम।।
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दोहा
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शिक्षा देनी चाहिये, शिक्षा जग की शान।
शिक्षा पाकर देश भी, बनता खूब महान।।
शिक्षा भर दे ज्ञान मन, आती जमकर काम।
शिक्षा से विद्वान जन, जग में पाता नाम।।
बासी भोजन भोग से, सेहत को नुकसान।
सादा खाना खाइये, कहता सकल जहान।।
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शिक्षा
दोहा
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शिक्षा देनी चाहिये, शिक्षा जग की शान।
शिक्षा पाकर देश भी, बनता खूब महान।।
शिक्षा भर दे ज्ञान मन, आती जमकर काम।
शिक्षा से विद्वान जन, जग में पाता नाम।।







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