जरा सुनो
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आज का विषय-
क्या अब किसान संगठन विरुद्ध और सुप्रीम कोर्ट के बीच दंगल होगा?
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जब बात नहीं मानी गई दो दंगल स्वाभाविक है। दंगल ही हार जीत का परिणाम होगा।
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कारवां
विधा-कविता
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लो कारवां चल पड़ा,
जाना हमें बहुत दूर,
अबके बिछुड़े मिलेंगे,
बिल्कुल नहीं गरूर।
इंसान की जिंदगी भी,
कारवां का एक रूप,
चलते चलते गिर पड़े,
कभी बन जाता भूप।
कारवां गुजर जाता है,
करता है जन आराम,
कारवां के संग चलके,
हो जाता है जग नाम।
एक से एक जब मिले,
कारवां तक बन जाता,
करावां गुजर जाए तो,
दिल को अति तड़पाता।
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अधरों पर मुस्कान
विधा-दोहा
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अधरों पर मुस्कान हो, दिल में प्रभु का नाम।
मात पिता को याद कर, बनते बिगड़े काम।।
अधरों पर मुस्कान जब, बहे प्रीत की धार।
परहित में जीना सदा, देता अनहद प्यार।।
अधरों की मुस्कान पर, देता जन भी जान।
खुशियां हर जन को मिले, करो नहीं अभिमान।।
अधरों की मुस्कान ने, एक दिया पैगाम।
खुशियों में जो जी रहा, होगा जग में नाम।।
किसान/अन्नदाता
विधा-कविता
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हर इंसान को धरा पर ज्ञान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए,
खून पसीना,दिन रात एक करता किसान,
उसके पसीने पर अभिमान होना चाहिए,
कृषक से जग में सद्व्यवहार होना चाहिए,
अन्नदाता का धरती पर मान होना चाहिए।
सर्दी,गर्मी,बारिश,आंधी आये या फिर तूफान,
बैल,ऊंट या ट्रैक्टर पर कर देता है एक जान,
कभी आराम नहीं,तन पर फटे वस्त्र पहने वो,
पूरे देश और जगत की किसान होता पहचान,
न्यौछावर करे जवानी कुछ दान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर..............................।
बच्चे भूखे रहते घर में नहीं तन पर पोषाक है,
मिट्टी में मिट्टी बनकर उगाए पेड़,झाड़ी शाक है,
सूखी रोटी,चटनी, छाछ या खाने में मिले अचार,
धरती मां उसकी प्यारी,बार बार करता चुचकार,
किसान की परिभाषा का विज्ञान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर................................।
साहूकार और सेठ से लेता है वो ऋण बेचारा,
ओलावृष्टि,अधिक वर्षा, रोग,ठंड ने भी मारा,
कभी फसल बर्बाद हो, बीजाई हो खेत दुबारा,
कभी कभी तो राम माया पैदावार देखकर हारा,
ऐसे दृढ़ संकल्पी की बस हुंकार होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर.............................।
पैदावार जब कभी लेता किसान खेत से अपनी,
लग जाते सेठ पीछे करते उससे ठगने की कार,
उसकी महानता देखो, खाली न जाए उसके द्वार,
काम के लोढ़ में वो बच्चों से नहीं कर पाता प्यार,
ऐसे संत महात्मा गुणी का एतबार होना चाहिये,
अन्नदाता का धरा पर................................।
जब आता अन्न घर में अमानत बन जाता सारा,
बच्चों के वस्त्र खरीद रह जाता अर्धनग्न बेचारा,
अन्न बेचकर पैसे आते उतार देता जो ऋण उधारा
नहीं हाथ में पैसे होते देखों किसान किस्मत मारा
ऐसे एक भगवान का जन उपकारी होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर................................।
कितनों के बच्चे पढ़ लिखते, उसका रहता पीछे
कई बार उसका बेटा, बेटी महज खेत को सींचे,
सब्जी,अन्न,फल और कितने मेवे वो ही करे पैदा
उसको देख नेता, मंत्री, संतरी अपने हाथ खींचे,
पूरे जगत में किसान का, सम्मान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर.............................।
अपने लहू से सिंचता धरा, मिल ना पाता मोल,
होती बात सोलह अन्ना सच्ची तराजू में ले तोल,
सबसे कम सम्मान जगत में होना चाहिए ज्यादा,
पूरा पैदा करे,कम पैसा मिले, खाना मिले आधा,
महामानव,महा उपकारी तो आधार होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर बस सम्मान होना चाहिए।
मान होना चाहिए जी, अभिमान होना चाहिए।।
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मेरा देश
विधा-कविता
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सब देशों से प्यारा है,
यह भारत देश हमारा,
अलग संस्कृति इसकी,
सब देशों से है न्यारा।
हट्टे कट्टे छैल जवान,
वीरों की भारत है खान,
दुश्मन का मुंह तोड़ देते,
देशभक्ति की है पहचान।
नहीं किसी झुके कभी है,
नहीं कभी भी झुक पाएंगे,
दुश्मन अगर हमें ललकारे,
हम सीना तोड़ दिखाएंगे।
वीेर हुए बड़े धीर हुये है,
नेहरु, गांधी,भगत, सुभाष,
परहित को चाहने वाले है,
दुश्मन दलन कर,करे नाश।






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