जरा सुनो
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आज का विषय-हमारी संस्कृति हमारा गौरव
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संस्कृति किसी समाज का गौरव होती है। इसे बचाने वाला समाज सदा सम्मान पाता है और गौरव का विषय होता है।
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-डोर
विधा-मुक्तक
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1
डोर खिंचती है हवा, उड़ता पतंग जोर।
तेज हवा जब चल रही, टूटेगी वो डोर।।
जिंदगी लगे जन सदा, पल दो पल का साथ,
डोर किसी की काट दे, मन का नाचे मोर।।
2
जीवन की इस डोर को, पकड़ों दोनो हाथ।
अगर छूट कर जा गिरे, जन मिले ना साथ।
डोर सदा पीछे रहे, पतंग जब आकाश,
डोर रहित जन को कहो,सारे जगत अनाथ।।
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नारी
विधा-कविता
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मत कहो अबला उसे,
होती जगत का आधार,
पूरे जीवन में बच्चों को,
जमकर देती वो प्यार।
कहने को कमजोर हो,
पर हीरे सी वो कठोर,
मन में जो भी ठान ले,
पूरा करे बिना ही शोर।
कोई जगह नहीं बची,
जहां वो नहीं मिलती,
देखकर नारी हिम्मत,
मन कलियां खिलती।
हार मानते उसके आगे,
हो चाहे कैसा टीरी खां,
उसके आगे एक चले न,
मिटा देगी पल में शान।।
भरा हुआ इतिहास भी,
इंदिरा को भी नारी जान,
पूरे जग में आज के दिन,
नारी की अमिट पहचान।।
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विषय-पतंग और डोर
विधा-कविता
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इंसान पतंग का रूप है,
जिंदगी उसकी है डोर,
कभी हवा में हिचकौले,
कभी उड़े मृत्यु की ओर।
अमीर के पास डोर बड़ी,
देता जाए ढील पर ढील,
कभी हवा में उड़ती जाए,
कभी गिरे जाकर वो झील।
अमीर पेच लड़ाते जमकर,
काट डाले गरीब की डोर,
गरीब बेचारे की पतंग को,
फाड़ डालते चिडिय़ा मोर।
आसमान में सबसे ऊपर,
अमीर की पतंग मिलती है,
देख देखके अमीर जन की,
मन की कलियां खिलती हंै।
पतंग डोर का साथ रहा है,
कभी डोर पड़ जाये छोटी,
अमीरों की पतंग देख देख,
गरीब जन पतंग भी रोती।।




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