Wednesday, January 06, 2021

 


सरहद
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सरहद की रक्षा करे, गजब वीर विश्वास।
माटी का टीका सजे, मारे दुश्मन खास।।
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दोहा
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फूल कली से कह रहा, जग के स्वार्थी लोग।
अपना काम निकालते, अजब गजब का रोग।।
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दोहा
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कहां गई इंसानियत, अजब लगा है रोग।
मार पीट कत्ल का,  रोज लगाते भोग।।
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तनाव/अवसाद/वेदना.
विधा-मुक्तक
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मिटा सदा ही वेदना, मन में धरना धीर।
धीरज जन धारण करे, हटती तन की पीर।।
आपस में मिलकर रहो, बढ़ जाती है प्रीत,
दुश्मन का मुंह तोड़ दे, वो कहलाता वीर।।






जल्दी क्या है
विधा-कविता
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धीरे धीरे रोज करो,
जल्दी बिगड़े काम,
जल्दी होता है बुरा,
काम करे शुभ शाम।

जल्दी क्या है अभी,
बढ़ते रहना है रोज,
धीरे धीरे सफल हो,
एक दिन होगी मौज।

जल्दी करने से कभी,
नहीं बढ़ेंगे जगत पेड़,
धीरे धीरे काम करो,
ऐसे तराने कोई छेड़।

ताई धापा कह रही,
सहज पके मीठा हो,
जल्दी तोड़ फल खा,
कड़वा मुंह स्वाद हो।

एक दिन में ना बने,
पौधे लगे नहीं फल,
जल्दी से जवान बने,
नहीं संभव यह हल।

विकास न हो तुरंत,
लगते हैं बहुत वर्ष,
धीरे धीरे काम बने,
होता जन को हर्ष।

बच्चे से बूढ़ा बनता,
बीते दिन और साल,
जल्दी में नहीं संभव,
करेगा समय कमाल।

चाहे 2022 आ जाये,
संभव ना यह लगता,
जल्दी क्या है इसमें,
समय पर ये सजता।

जल्दी क्या है कहते,
जगत के  जो इंसान,
कभी कभी गलत हैं,
वरना वो बने महान।

ट्रेन छूटने का समय,
बचे है पल दो पल,
जल्दी क्या है कहते,
तो नहीं निकले हल।

पेपर में प्रश्न करते,
करना जल्दी काम,
जल्दी क्या है कहे,
होगा जन बदनाम।

कभी जल्दी ठीक है,
कभी जल्दी  खराब,
समय पर काम करो,
आएगी तन पे आब।।
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मेघा
विधा-कविता
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मेघा गरजे नभ पर आज,
खोले सारे वर्षा का राज,
बरसेंगे वो जमकर आज,
किसान को है बड़ा नाज।

मेघा काले पीले हो रंग,
पानी भरा है उनके अंग,
भीगों देंगे चोली-दामन,
लोग हो रहे उनसे तंग।

मेघा जब कभी आते है,
खुशियां देकर हर्षाते है,
किसान हो जाते विभोर,
फिर तो फसल उगाते हैं।

कवियों का हो आधार,
कवि करते उनसे प्यार,
लिखते हैं काव्य उनपे,
नहीं रखते कभी उधार।

जब मेघा बरसते घोर,
नाच उठते वन में मोर,
मचा रहे है दादुर शोर,
तान छेड़के करे विभोर।

मूसलाधार जब बारिश,
आती है तब बाढ़ भारी,
ऐसी बाढ़ के आगे चुप,
बाढ़ समक्ष दुनिया हारी।

मेघा जब नभ पर आये,
प्रेमी जन मन ललचाये,
मिले प्रेम से तब हर्षाये,
फिर मिलन गीत गाये।
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अरमान
विधा-कविता
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पूरे जब अरमान हो,
दिल में उठती उमंग,
दिल बाग बाग होता,
दिखलाएगा नया रंग।

अरमानों  को दबा दे,
कुंठा रूप नजर आये,
इंसान जीते जी मरता,
कुछ नहीं उसे सुहाये।

अरमान सदा पूरे करो,
जीवन  बनेगा सफल,
अरमानों को भूल जा,
जीवन बनेगा असफल।

अरमान मिले हर जन,
पूरे मुश्किल हो काम,
अरमानों का गला घुटे,
हो अंतिम वही शाम।

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